ब्रह्मचारी किसे कहेते है?

 ब्रह्माध्ययन संयुक्तो ब्रह्मचर्यरतः सदा॥
सर्व ब्रह्मेति यो वेद ब्रह्मचारी स उच्यते॥५१
श्लोकार्थः ब्रह्माध्ययन से युक्त, सर्वदा ब्रह्मचर्यमें प्रीति रखनेवालेके लिए सर्व ब्रह्म है,एसा जो जानता है वो ही ब्रह्मचारी कहेलाता है।                   
    
      आध्य जगदगुरु शंकराचार्य एक महा ब्राह्मिन थे|उन्होने हिंदु धर्ममेंसे बदीओंको हटानेके लिए खूब महेनत की थी। छोटी उमरमें ही देवलोक  हुए थे। उस समयका भारत मतलब जगत। भारतके, जगतके सभी पंडितोको हराया था। एक मात्र महा पंडित मंडन मिश्र बचे थे उनको भी हराया, पर उनकी धर्मपत्नी महा विदूषी ने प्रश्न उठाया की में उनकी अर्धांगीनी हुं तो मुझे हराओं तो ही हार मानी जाय | ओर बालब्रह्मचारीको कामशास्त्रके विषयमें प्रश्न पूछे| बालब्रह्मचारीने थोडा समय मांगा ओर उसमें ज्ञाता बनके पंडित पत्नीको भी हराके जगदगुरु कहेलाए| किस तरह ज्ञाता बने वो एक रहस्यमय कहानी है।     
   कुछ टीकाकार ब्रह्म अध्ययनकी जगह वेद अध्ययन कहेते है। शायद वेद ही ब्रह्म अध्ययन हो एसा मानते हो। पर शंकराचार्य वेदोके ज्ञाता थे। उन्होंने वेद अध्ययन शब्द ही क्यू नहीं  कहा? दूसरा उसमे शंकराचार्यने कहीं स्त्री शब्दका उल्लेख नहीं किया है और नही कहा है की स्त्रीसंग से दूर रहो. पर शायद टीकाकार खुदकी ही मान्यताओं को थोपते हो।    
   सदाचार का मतलब क्या है? अच्छा आचरण करना एसा सादा अर्थ है। किसीको तकलीफ ना दे एसा आचरण| महापुरुषोके आचरणको देखके एसा आचरण अपनाओ या  खुद ही अंदरसे जाग्रत हो के सर्व ब्रह्म है एसी अनुभूति करके ज्ञान प्राप्त हो जाए,ओर अपनेआप आचरण बदल जाये।
   महापुरुषोका आचरणकी नकल एक उपाय है,दूसरा खुदकी  अंदरसे जागृतिसे सदाचरण आना। चाहे बहुत सारे साद आचरण के  श्लोकोका पठन करो फर्क नहिं पडता बल्कि एसा हो शकता है की खंडित व्यक्तित्व हो जाए। एक उदाहरण देखते है भगवान महावीर  एक चींटीको देखकर उसको बचानेके लिए कूद गये। उनहोंने ये जाना है की सर्व ब्रह्म है ओर उसका अनुभव भी किया| इसलिए वो किसीको भी दुःख नहीं दे शकते। अब जैन क्या करेंगे? चींटीको देखके कूद जाएगें,चींटींके दरमें आटा डालेंगे पर व्यवसायमें किसीकी जेब काटनेमें उन्हें ब्रह्म नहीं दिखेगा या जीव नहीं दिखेगा। ये अकेले जैनोकी बात नहीं है हरेककी है। बहुत सारा दान देना, पशुओंके लिए पांजरापोल खोलेगें ओर दूसरी ओंर बेंकोसे करोडो गरीबोंके पैसे ऐंठ लेनेमें उनका जी नहिं हिचकिचायेगा।
    *दूसरी एक नकलकी बात भगवान महावीर १२ साल तप ओर साधनामें रहे तब एक चींटीमें भी ब्रह्मकी अनुभूति हूइ थी। इन १२ सालमें भोजनके कुल दिन गिने तो एक साल ही भोजन लिया था।मानो की   उन्होंने तय किया की मै भिक्षा तब लूंगा जब कोई  लाल कपडे पहेने हुइ स्त्री हो, जिनके हाथमें नन्हा बालक हो, पासमें सफेद रंगकी गाय हो तो हि भिक्षा लूंगा नहीं तो वापस आ जाऊगा। एसी परिस्थिति कब हो? जब तक एसी परिस्थिति ना हो तब तक उपवास किये। एसी शक्यताए १२ सालमें एक सालके दिन जैसी ही हुइ थी मतलब की ३६५ दिन ही भोजन प्राप्त हुआ। अब आजके महाराज क्या करेंगे? एसा नियम तो ले लेंगे ओर भक्तोंको पहेले से एसी शक्यताओंकी व्यवस्था करने के लिए बोल देगें। सब कुछ तैयार ओर महाराजसाहेब आके ये देखके भिक्षा लेके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेंगें। ये तो दंभ हुआ ना? ये आचरणकी नकल हुई इसका क्या अर्थ हुआ? 
 
         *महावीरनी अहिंसा अंदरकी जागृतिके कारण थी जैनोकी नहीं होती॥ भगवान बुद्धकी करूणा अंदरकी जागृतिके कारन थी। अपनी नहीं हो शकती॥ महापुरुष कहेते है की क्रोध नहीं करना चाहिए। अगर हम क्रोध  करना बंद करते है तो क्या होगा? क्रोध अंदर इकठा होगा॥ छोटी छोटी बातों की निराशा क्रोधके स्वरूपमें इकठी होगी। छोटी छोटी अवहेलना क्रोध बन जाएगी बहार से शांत ओर अंदर से जवालामुखीके रूपमें एनर्जी जमा होती रहेगी। ओर एक दिन छोटे से बहाने मिलने पर जवालामुखी फटेगा। मेरा एक मित्र है हमेशा शांत, सदा हंसते रहेते है, सबको हेल्प करते रहेते है, बहार से बहुत अच्छे लगते है. पर हररोज जोबमें ब्रेक में रातको २ बजे चूपके से छुपाया हुआ शराबका पेग मारते है, ओर बादमें अंदर भरा हुआ क्रोध बहार निकलता है। सबके साथ झगडते है ओर उग्र बन जाते है। बादमें ओफीसमें जाके सो जाते है फिर चार बजे जागते है तब फिरसे सरल ओर शांत हो जाते है।
     चलो हम दुर्गुणोसे बचनेके लिए जंगलमें चले जाते है पर वहां भी क्रोधित होने का कोइ चान्स नहिं है। और वापस भीडमें आते है तब अचानक किसीका  पैर पांवपे  पड गया तो गुस्सा आ जाए तो वर्षोकी साधना नाकमयाब रहेगी। एक गुरु ओर उसका शिष्य जा रहे थे रास्तेमें नदी आइ| वहां एक स्त्री नदी पार करने के लिए खडी थी उसे तैरना नहीं आता था। इसलिए वो राह देख रही की कोइ उसे नदी पार करवाऍ। गुरु तो ब्रह्मचारी थे स्त्रीके सामने देख नहीं शकते तो छू कैसे शकते? गुरुने मना कर दिया, पर शिष्यको दया आ गइ उसने  उस स्त्रीका हाथ पकडके नदी पार करने लगा पर पानी ज्यादा गहेरा था इसलिए शिष्यने उस स्त्रीको कंधे पे उठा लिया। ओर नदी पार करवाइ।गुरु शिष्य फिर आगे चले। पर गुरुको चैन नही आया| गुरुको लगाकी शिष्यने गलत किया, स्त्रीका हाथ पकडा और उठाया भी, महापाप हो गया। ब्रह्मचर्यका भंग हुआ। आश्र्म पहुंचने तक शिष्यको डांटा की तुम्हें उसे कंधे पे उठाने की जरूरत नही थी शिष्यने उत्तर दिया की हे! गुरुजी मेंने तो  उस स्त्रीको नदी पार करने के बाद तुरंत उतार दिया पर आप तो अभी तक उठाके घूम  रहे हो। इसे कहेते है बाहरी आचरण।
             हम भारतीय सदाचारके श्लोकोमें ही खोये रहेते है। हमेंशा ब्रह्मचर्यकी बातें करते है, स्त्रीओके दुश्मनकी तरह बर्ताव करते है। क्या स्त्रीओमें ब्रह्म नहीं है? कुछ संप्रदाय वाले स्त्री के मुख तक नहीं देखते|सेक्स को गाली देते ही जाते है|  और सेक्स अंदर ही सप्रेस्ड होता है। थोडा सा चान्स मिला और सेक्स बाहर। बसमें या कहीं भी स्त्री पासमें बैठी तो परेशान करना चालु। मात्र स्पर्श तो ठीक स्त्रीका वस्त्र भी शरीरको छूये तो भी विहवळ हो जाते भारतयोकी सदाचारकी बातें सुनके हंसी आती है| ब्रह्मचर्यका कठिन पालन करेंगे और बादमें कीसी स्त्रीभक्तके प्रेममें फंस जायेंगे। जैसे नित्यानंद फंस गये। किसीने बिपशा बसुके स्तन पर भीडका फायदा उठाके हाथ फेर लिया। एसे है ब्रह्मचर्यके  फायदे।     
    उपरके श्लोकमें शंकराचर्यने कहीं पर भी स्त्रीका उल्लेख नहिं किया| ब्रह्म मे विहरना मतलब ब्रह्मचर्य| सदाय ब्रह्ममें रत रहेनेवाला, मग्न  रहेनावाला, सर्व ब्रह्म है एसा जाननेवाला ब्रह्मचारी माना जाता है। क्या स्त्रीमें ब्रह्म नहीं है? एक नन्हीं बच्चीमें ब्रह्म है एसा मान नहीं सकते? क्युं बेचेन हो जाते है? क्युं की अंदरसे सर्व जीवमें या निर्जीवमें शंकराचार्यकी तरह ब्रह्म नहीं दिखता। जो लोग सेक्स को दबाते है वे  लोगों ही ननहीं बच्ची पर रेप करते है। बच्चीमें बच्ची नहीं पुख्ता  स्त्री दिखाइ देती है इस  लिए बलात्कार कर सकते है । और बादमें मार भी  देते है। जो साधु स्त्री का मुहं तक नहीं देखते नन्ही एक साल की बच्ची तक का मुंह नहीं देखते,वो  नन्हीं बच्चीमें बड़ी  स्त्री को देखते है,उनके सामने अपनी बच्ची को मत ले जाओ। दूर रखो नन्हीं फूल जैसी बच्चीओंको। नन्हीं बच्चीओं पर बलात्कार करनेवाले  क्रिमिनल्स और ऐसे साधुओंमें तात्त्विक रूपसे या मानसिक रूपसे कोइ फर्क नहीं है। चाहे वो लोग अपने पंथके हितमें बलात्कार ना करे फिरभी उनकी बूरी नजरोंसे भी बचाना चाहिए।
      १६०००रानीआं पटरानीआं, महारानीआं  और प्रेमिकाए रखनेवाले श्री कृष्णको मुक्त महापुरुषोने ब्रह्मचारी कहा है। क्या ये सब अज्ञानी थे? आजके साधु या बाबा कहेत है वो सच की मुक्त महापुरुषोने कहा है वो सत्य? कि शंकराचारय कहेत ये वो सही?      
    पहेले अंदरसे जगृत बनना चाहिए। सर्व चीजवस्तु मात्र, जीवमात्रमें ब्रह्म है ये जानना चाहिए। किसी सदाचारकी नकल नही करनी पडेगी। अंदरसे ही सदाचार आ जायेगा। फिर  आप किसीकी जेब काट ही नही सकते। किसी चींटीको मार नहीं सकोगें या उसे देखके कूदना नही पडेगा अपनेआप हो जाएगा। किसी टेक्सकी चोरी नहीं कर पाओगें, भाव ज्यादा नहीं ले पाओगें, कमतोलमाप में चीज नहीं देगें, किसी पर बलात्कार नहीं कर पाओगें, किसीकी उपस्थिति आपको विचलित नहीं कर सकेंगी। सर्वमें ब्रह्म देखेंगे तो किसीको दुःख नहीं दे सकोगें। शंकराचार्यने सभी श्लोक ब्रह्म को जाननेके बाद लिखे है।              
     तो फिर क्या करना चाहिए? सदाचारका आचरण नहीं करना चाहिए? जरूर करना चाहिए। किसीको अचानक तकलीफ क्यूं देनी चाहिए? पर साथ में ध्यान भी करना पडता है। ध्यान ही एक मात्र उपाय है। किसी सदाचारकी नकलसे ब्रह्म नही जान सकतें। अंदरकी जागृतिके लिए ध्यान करो कोइ व्रत या जप तप की आवश्यकता नही है। ध्यानसे ही धीरे धीरे अंदरसे शांत होते जायेगें और बाहर सदाचार आता रहेगा और बढता जाएगा। पता भी नहीं चलेगा।  जे. कृष्णमूर्ति उसे चोइसलेस अवेरनेस कहेते थे । एक साक्षीभाव जागता है, अनासक्त योग पेदा होगा अंदरसे शांत होने से काम(सेक्स)के प्रति रसकम होगा। क्रोध कम हो जायेगा। सबमें ब्रह्म है एसी प्रतितीसे प्रेम और करूणा बढेगी॥ तो बाबा साधु लोगोंने गलत मतलब निकाल दिया की कामसेक्स से दूर रहेना चाहिए। पर ये बाबा साधु तो काम(वर्क)से भी दूर रहेने लगे। गांधीजीने काम-सेक्सको जितनेके प्रयास बहुत सारे किये पर ध्यानको महत्व नहीं दिया और बुढा काम को बिना जीते चले गए। बाह्य सदाचरणसे पाखंडी बन जाते है अगर साथमें ध्यान नहीं किया तो|

3s टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. सागर नाहर
    अप्रै 12, 2011 @ 01:22:26

    भगवान महावीर के उपवास की जिस कथा का आपने उल्लेख किया है, वह मूल कथा से थोड़ी अलग है।
    दरअसल भगवान महावीर ने छ: महीने के उपवास के बाद आहार लेने के लिये निकलने से पहले(गोचरी जाने से पहले) प्रण ( जैन शास्त्र के अनुसार -अभिग्रह) किया था कि एक स्त्री जो बेड़ियों में जकड़ी हुई होगी, खाने के लिए सूप (सूपड़ी) में उड़द के बाकले होंगे, जो आधी घर और आधी बाहर (यानि देहरी पर) खड़ी होगी और जिसकी आँखों में आँसू होंगे उसके हाथ से आहार लूंगा।
    संयोग से देवी (सती)त्रिशला इन परिस्थितियों में खड़ी मिली लेकिन आँख में आँसू ना होने के कारण महावीर वापस मुड़ने लगे कि त्रिशला के आँख से आँसू छलक पड़े की मैं कितनी अभागन हूँ कि भगवान महावीर के उपवास का पारणा भी नहीं करवा सकी! त्रिशला की आँख में आँसू देखते ही महावीर ने त्रिशला के हाथों से आहार स्वीकार किया।

    आपकी एक और बात का जवाब मैं भी कई साधुओं से पूछता हूं पर कोई सही जवाब नहीं दे पाया- कि साधू को अगर स्त्री शरीर का स्पर्श हो जाये तो क्या परेशानी है? एकाद साधु ने कुछ हद तक ठीक बताया कि हम भी साधू हैं “केवली” या “वीतरागी” नहीं! हो सकत है कि ऐसा करने से हमारा मन भी विचलित हो सकता है।
    अच्छे लेख के लिए धन्यवाद और बधाई।

    Reply

  2. girlsguidetosurvival
    जून 19, 2010 @ 21:26:16

    …पर ये बाबा साधु तो काम (वर्क)से भी दूर रहेने लगे। Bahut Khoob :) .

    Doosare karenge na yeh Kaam (work). Har jeev mein agar brahm ki anubhooti karein to sach kisi ko kasht pahunchaan se pehale das baar sochana padega. It is too much. Chalne do jaise chalta… Jyada suvidha janak jaan padta hai.

    Jari Rahiye…

    Peace,

    Desi Girl

    Reply

    • Bhupendrasinh Raol
      जून 20, 2010 @ 00:46:37

      धन्यवाद,आपको पता है?भारत में ५ मिलिओन माने ५० लाख साधू है,जो कुछ भी करते नहीं है|उनके खाने पिने,चरस,गांजा,मारिजुआना,चायपानी,खाना पीना,दूध,फलाहार.सब खर्चा भारत की जनता पर है|मेरा एक और आर्टिकल थोड़े दिन में आएगा|९००० करोड़ सालाना खर्च भारत की जनता पर है,बिना वजह|

      Reply

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