What is Love?(प्रेम पुराण),,,,,,,,,प्रेरणामूर्ति मीरां.

       What is Love?        

         मेरे एक परम मित्रने सवाल किया की प्रेम क्या है?लव के बारे में कुछ लिखो| मेरे जैसे उग्र लिखने वालेको एसा सवाल? पर क्या करे फरमाइश पूरी करनी ही पडेगी। शायद उनका मक्सद होंगा की  थोडे समयके लिए उग्रतासे कोमलता तरफ जाउं। ब्लोगाचार्य कहते है की ललितभाव जागने चाहिए। प्रेम शब्दकी बात आती है तो पहले  ख्याल मुझे मीरां का ही आता  है। मेवाड की  मीरांबाई(ई.स. १४९८-१५४७). मीरां राजकुंवरी थी। मेडताके राजा रतनसिंह राठोड्की बेटी थी। जोधपुर शहेरको बसानेवालेके वारिश  थे। मीरांकी शादी चितोडके महाराणा सांगा के बेटे भोज के  साथ हुइ थी। ये महाराणा सांगाने बाबर के साथ युद्ध किया था। सबसे बडे बेटे कुंवर भोज उस युद्धमें मारे गये। पर मीरां मनसे कृष्णको अपना पति मानती थी उस लिए वो विधवा नहिं हुई। लोहीकी सगाईमें मीरां जगविख्यात महारणा प्रतापकी बडी काक़ीमा थी। कुंवर भोज महाराणा प्रतापके पिता उदयसिंहके बडे बाई लगते थे। ये उदयसिंहके कारण सबसे ज्यादा सुंदर शहर उदयपुर मिला। विदेशी सहेलानीयाओंका एक सर्वे हुआ था उसमें भारतका सबसे श्रेष्ठ शहर धूमने के लिए उदयपुर पहेले नंबर पे है।
प्रेमदीवानी मीरां, दर्ददीवानी मीरां ईतिहासकी एक अमर छवि  है। मीरां जब छोटी लडकी थी तब कीसी महेमान साधुके पास एक श्री कृष्णकी मूर्ति थी. बालमीरांको वो मूर्ति पसंद आ गई। मीरांने साधुसे वो मूर्ति मांगी पर साधुने देनेसे इन्कार किया और चल दिया। पर साधुके अचेतन मनमें मीरांका मूर्तिके प्रति जो प्रेम अंकित हो गया होगा। इसलिए साधुके अचेतन मनको चेन नहीं हुआ उसे सपने आने लगे और साधुने वापस आके मीरांको वो मूर्ति दे दी। और तबसे मीरां कृष्णकी दीवानी हो गई। कृष्णकी भक्तिमें मग्न हो गई। मीरांबाईने जिंदगीके आखिर के दिन द्वारिका(गुजरात) में बिताएं।
 
        *मूर्ति तो एक बहाना था। प्रेम तो मीरांके अंदर कूट कूटके भरा था। मूर्तिके बहाने बाहर आया। मीरां प्रेममय बन गई। मूर्ति कृष्णकी थी वो कृष्ण तो ५००० साल पहेले हुए थे। मीरांने कहां कृष्णको देखा था? राधाने तो कृष्णको देखा था। फिरभी कृष्णने एकबार गोकुल छोडा बादमें कभी वापस गोकुल नहिं गये थे। अगर प्रेम आपके अंदर है तो कृष्ण तो एक माध्यम है। आधुनिक युगमें क्या मीरां हो शकती है। अगर कीसीको मालूम हो तो बताएं।

           *सती किसको कहेते है। सामान्य पुरुषके प्रति असीम प्रेम हो और उसके बिना जीना दुस्वार हो जाए। कोमन  पुरुष तो बहाना है। सतीके अंदर ही प्रेम कूट कूटके भरा होता  है। जला देने से कोई सती ना बन जाए। धार्मिक या सामाजिक दंभीओंने लाखों स्त्रीओंको भारतमें एसे ही जला दी है। हुण लोग बहारसे आये और सती होने की परंपरा ले आये| ये एक बडी दिमग अंग्रेजोके कारण नष्ट हुई। थेंक्स टु ब्रिटिशर।
      *प्रेम हजारों लाखों फूलों की सुगंघ है| फूल ये नहीं कहेता  की मै मेरी महेक कीसी एक  को हीं दूंगां। फूल ये नहीं कहेता की मेरी महेंक सिर्फ उसके लिए है और इसके लिए नहीं है। सिर्फ एक शर्तमें प्यार हो गया व्यापार| प्रेम मुक्ति है। बंधनमें बंध जाए तो मोह बन जाए। गुजराती लेखिका वर्षा पाठकने लिखा है ‘मुझे बेटेको श्रवण नहीं बनाना है। बेटे को श्रवण बनाके रखनेवाली माता मोहवश है, प्रेमवश नहीं है| कभी बेटेको ‘राम’ भी मत बनाओं। राम बनानेवाले पिता अहंकारग्रस्त है। पिताको आज्ञापालक संतान अच्छी लगती है। पिता भगवान नहीं है। वो भी अयोग्य मांग रख सकते है। बच्चो के  प्रति मोह कब तक रखोगें? ये शिखना है तो प्राणीओं से शीखे। में शीखा हुं एक चित्तेके जिवन कवनको टीवी पर देखकर। संतानोको मोहसे मुक्त रखकर सारी जिंदगी प्यार करने से कौन रोकता है? जन्म देकर उनके मालिक बननेका कौन कहेता है? प्रेम मे मालिकी भावही प्यारका सत्यानाश करता है। पुत्रकी शादी होते ही माताको लगता है की २५ साल तक मेरा था अब कीसी ओर का हो गया। साडीका पल्लु पकडनेवाला अचानक अब दुपटेके पीछे घूमेगा। फिर दोनों और का मालिकीभाव शुरु। बेटेकी अंगत जरूरतको माता पूरी कर सकती है क्या ? प्रेम मुक्त करता है और मोह बंधन देता है। मोह शुध्ध  बने तो  प्रेम और प्रेमकी अशुद्धि मोह। प्रेम जीनेकी ताकत देता है, मोह जीना दुस्वार कर देता है।
   

      * प्रेम कीसीको दुःख देने के प्रयास नही करता पर मोह और मालिकीभाव कर सकता है । जब कोइ साक्षर या चिंतक रामायणको प्रेमका महाकाव्य कहेते है तब मुझे गुस्सा आता है, हंसी भी आती है । लक्ष्मण बन्धुप्रेममें मग्न था । पर लक्ष्मणको तो ठीक राम जैसे महापुरुषको भी उर्मिलाका ख्याल क्यूं नहीं आया?  सबसे ज्यादा महान प्रेम तो उर्मिला का हुआ । प्रेममें बेटेको वनवास कैसे दे सकते है? हम बेटेको उनकी मनपसंद केरीयरमें पढने ना देकर  और उसके स्वप्नोको ना पूरा करके चौदाह सालकी जगह पूरी जिंदगीका वनवास देते है । प्रेममें अग्निपरीक्षा? प्रेम और त्याग प्रिय पत्नी  का? प्रेमका महाकाव्य? हा!!हां!हां!ह!!!! कौन ज्यादा  बलिदान देता है और सदीओं तक बने रहे ,ऐसे बलिदान लेने देनेकी जैसे स्पर्धा लगी है । ऋषि पत्नी अरुंधतीने प्रण लिया था की रामके द्वारा  त्यागी हुई सीताके बिनाकी अयोध्यामें  कभी पांव नहीं रखुंगी। प्रेम परोक्ष रुपसे किसीको दुःख नहीं देता। ईसलिए कहेता हुं की अहिंसा सिर्फ भगवान महावीरकी। करुणा सिर्फ भगवान बुद्धकी और प्रेम सिर्फ मीरांका । 
 
        *सहानुभूति, सिम्पथी प्यार नहीं है । वो तो एक सामाजिक व्यवहार है। सहानुभूतिको अगर प्रेम माना तो दुःखी होंगे। फिर बारबार सहनुभूतिकी जरुर रहेगी। बीमारको सहनुभूति ज्यादा मिलती है और अच्छि भी लगती है। सगे संबंधी, पतिदेव, बेटे-बहु सब आसपास जमा होंगे। फिर ये दुष्चक्र चलता रहेगा। जैसे किसीने नोटीस करना बंद किया, तो हो गए बीमार| फिरसे सब जमा। हररोज सब लोग हाल पूछने लगेगें। अच्छा लगने लगेगा। बीमारीमें रस लेने लगे तो गये कामसे। जरासा किसीने ध्यान नहीं दीया हो गये बीमार। प्रेम जीनेकी ताकत है और सहानुभूति बीमार रहेना शीखाता है। ये एक मनोविज्ञान है। भारतमें मनोविज्ञान नहीं शिखाते| अमेरिकामें कोलेजमें किसी भी कोर्समें कुछ सायकोलोजी कम्पलसरी पढनी पडती है।
     

        * ध्यान, नोटिस ये सब मनकी  खुराक है। घरमें महेमान आते है तो बच्चोंको नोटिस नहीं करेगें तो बच्चे मस्ती करेगें या जोरसे बिना कारन रोने लगेगें या खाना मांगेगें। पूरा दिन औरते पासपडोशमें गप्पें लगायेगी, टीवी पर सांसबहूके झगडेवाली सिरियल देखेंगी या माताश्रीके या सहेलीओंके साथ फोनमें बातें करेंगी और जैसे ही पतिदेवके आनेका समय हुआ की सिर पकडके विक्स लगाके सो जाएगी। पतिकी सहानुभूति चाहिए। पति चिंतित हो जाए तो मजा आ जाए। थोडे आगेपीछे घूमे  तो अच्छा लगता है। सिरदर्द गायब। जेन्युइन बीमारी के सिवा ज्यादातर बीमारी सायकोसोमेटिक-मनोशारिरीक होती है।  परीक्षाके वक्त ही बच्चोंको शरदी जुकाम हो जाती है, बुखार आता है॥ ये सब अचेतन मनकी करामत है। चाइल्ड सायकोलोजी सभी माबाप को पढनी ही चाहिए।   अमेरिकामें तो pet सायकोलोजी मतलब पालतू जानवरकी सायकूलोजी भी पढाते है । सहानुभूतिको  प्रेम मानते हो और बारबार बीमार हो जाते हो तो जरा सोचना सहानुभूति पानेकी आदत तो नहीं हो गइ ना? बारबार बीमार रहेते हो और डोक्टर अशक्त  होने की बात करे और कुछ निदान ना करे और शक्तिकी या एन्जाइम या पाचनकी दवायें दे या केलशियम-आयर्न की गोलीयां दे तो समज जा ना की सहानुभूति पानेकी आदत बन गइ है। हररोज विक्स लगानेकी जरुर लगे तो समजना सहनुभूतिकी आदत हो गइ है।
     
                सहानुभूति को प्रेम समजनेकी भूल मत करो| मेरे पिताश्रीको हार्ट एटेक आया था। गांधीनगर (गुजरात) की सिविल होस्पिटलमें दाखिल किया था। पूरा गांव खबर पूछने आया था । बहुत भीड हो गइ थी॥ तब डोक्टरने मुझे एक बात कही थी। ये सब सिर्फ अपनी हाजरी देने आये है। कई लोगोंको हाजरीपत्रक भरवानेकी मजा आती है। कोइ अगर किसी कारनवश ना आ सका तो वो ध्यानमें लिया जाता है। एक आप ही नहीं आये थे एसा कहेके गिल्टी फिल कराते है। अगर इसकी आपको  आदत पड गइ तो समझ लो आप हाजरीपत्रक भरने के लिए बीमार पडते है। कइ लोगोको आदत होती है हररोज रातको या सुबहको पत्नीके पास पैर दबवानेकी या बदन मसलवानेकी। उसकी खास आवश्यकता नहीं होती है पर सेवाकी आदत हो जाती है। हररोज पैर दुःखे तो डोक्टरसे सलाह लेनी चाहिए।
    
                  प्रेम मुक्तिका मार्ग है। मोह बंधन का और सिम्पथी  बीमारीका| दो आत्माके बीचका मिलन प्रेम है। दो शरीरके बीचका मिलन काम(सेक्स) है। दो आत्माओंके साथ दो शरीरका मिलन समाधि है। शायद वो समाधि क्षणिक हो पर व समाधि ही है। बारबार समाधिमें उतरके नित्य युवा रहेने के भरपूर होर्मोन्स पा सकते  है। बहुत सारे रोगो दूर हो जाते है। मन प्रफुल्लित रहेता है, स्ट्रेस कम होता है। स्त्रीओमें इस्ट्रोजन लेवल बढनेसे स्त्रीत्वमें वृद्धि होती है और पुरुषोमें टेस्टाटोरिन  लेवल बढने से पुरुषत्वमें वृद्धि होती है। इसलिए समाधिमें उतरने की बातमें कंजूसी नहीं करनी चाहिए| इसी सायन्सको नहीं समजनेवाले साधू बाबा  गुरुओकी बातें माननी नहीं चाहिए।
 
                        ये प्रेम पुराण कथा भगवान विष्णूजीनेस्वयं हमें बताई थी| फिर हमने मुनि  श्री फ्रोइडको सुनाइ। मुनि फ्रोइडने हमारी आज्ञासे मुनिश्री एडलर, कार्ल जुंग(युंग), डो. मृगेश वैश्णव(अहेमदाबादके) को सुनाइ । या तो सभी मुनिश्रीओ द्वारा हमने सुनी हो ऐसा भी हो सकता  है। क्योंकी हम  अहं ब्रह्मास्मि में मानते है। ये सब मनोवैज्ञानिक मुनिश्रीओ ब्रह्म है| हम भी ब्रह्म है। आप सर्वे वाचकगन  बी ब्रह्म है। शायद विस्मृतिके कारन भूल गये हो इसलिए   फिरसे कहेनी पडी। इतिश्री राओल रचित प्रेमपुराणका प्रथम अध्याय समाप्त| ये प्रेमपुराणका नित्य पाठ करने से घरमें आधि,व्याधि,उपधि नष्ट होती है। घरमें बीमारी नहीं आती। बच्चे स्वस्थ रहेते है। इसलिए पैसे व्यय नहीं होते। लोगोंको घरमें ही समाधिका अनुभव होता है। और गुरुओके पास जान नही पडता। बाबा  गुरु भूखों मरेगें पर देशको तो लाभ होंगा|

2s टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. JAT BOY जौधपुर
    फ़र 24, 2011 @ 01:55:41

    वा…..

    Reply

  2. rajeevkumarkulshrestha
    जून 17, 2010 @ 07:07:42

    सर जी आपके विचार पङकर आनन्द आ गया । पर इस सम्बन्ध में
    आपका ग्यान कुछ हटकर है । मेरे ख्याल में सत्यता इसके विपरीत
    है । मीरा के बारे में अगर आपको सही जानकारी प्राप्त करनी है ।
    तो कृपया एक बार मेरे ब्लाग्स का अवलोकन कर लें । आपके प्रेम
    या समाधि पर भी उतने सटीक विचार नहीं हैं । कृपया अन्यथा
    न लें और मेरे ब्लाग्स को देखे । तमाम सच्चाई आपको स्वयं पता
    चल जायेगी ।
    rajeev kumar kulshrestha
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

    Reply

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Net jagat

free counters
Blogvani.com
brsinhji11.wordpress.com
50/100
Follow

Get every new post delivered to your Inbox.