गुरु गुलामी!!!!५० लाख साधु? बापरे!! अधधध!!!

 गुरु गुलामी!!!!५० लाख साधु? बापरे!! अधधध!!!
         *गुलाम मानसिकताको लोग कोलोनियल माइन्ड कहेते है। अंग्रेज  २२० वर्ष भारत पर राज करके गये। इसलिए प्रजाकी मानसिकतामें अंग्रेजी  और अंग्रेजोकी प्रति गुलामी खूनमें आ गइ  है। पर गुरुगुलामी तो प्रजाके अचेतन मनमें समा गइ  है और संतानोको वारसेमें जीन्समें भी देते जाते है।
                   किसीको कोइना कोइ गुरुके बगैर जैसे चलता ही नहीं। ईन्दिरा गांधी हो या जवाहरलाल के गांधीजी या  किसी भी नेता, सब गुरुके पास आशीर्वाद और  सलाह लेनेके लिए दौड जाते है। दूसरे देशके नेता साधुओकी सलाह लेने नहीं जाते, इसलिए वो भारत से बलवान है, और आगे है। साधुओंकी सलाह लेके देशका भला कहां हुआ? देश तो हजार साल तक गुलाम ही रहा है, गरीब और कायर ही रहा है। भीखारीओंकी सलाह से कभी देश बलवान हो सकता है भला? जो मुर्ख होते है वो देशको चलाने के लिए साधू ओंकी सलाह लेने दौड जाते है। हा कोइ अपवाद हो शकटा  है, जैसे की चाणक्य। पर एसे अपवाद कितने? चंद्रगुप्तका साम्राज्य बलवान था क्योंकी चाणक्यने जासूसी संस्थाका महत्व समजाया था। राज्यके जासूस सीधे चाणक्यके पास माहिती देने  चले जाते थे| बाग्लादेशका १९७१में अस्तित्व हुआ उस युद्ध को आधा तो  भारतकी ‘रो’ नामक जासूसी संस्था के कारण ही जीते थे। इस ‘रो’ को छोटा करके लगभग निष्क्रिय बना देने का महापाप श्रेष्ठ जाने जाते मोरारजी देसाइने किया था। कच्छ जितना छोटा इजराएल  देश को कोइ नहीं दबा सकता इसका कारण उनकी जासूसी संस्था ‘मोसाद’ है।
 
            सबको आशीर्वादसे काम चलाना  है। कोइ महेनत नहीं करनी, कर्मका नियम है की कर्मका फल मिलता ही है, कर्म भगवानको भी नहीं छोडते तो फिर आशीर्वादकी क्या जरूरत? अगर प्रार्थना किये  खराब कर्मो या की गइ भूलमेंसे मुक्तिके लिए करते हो तो फिर कर्म के नियम का क्या अर्थ ? बाकी प्रार्थना करते ही रहो कोइ फर्क नहीं पडेगा। भगवान महावीर इस कर्मके नियम को जानते थे, इसलिए जिंदगीमें कभी प्रार्थना नहीं  की थी। भारतमें लगभग ५० लाख साधु है एसा गुजराती दिव्यभास्करमें किसी आर्टीकलमें पढा था। जो ये सच्चा हो तो?
        
                ये ५० लाख साधु कुछ काम नहीं करते|कीसी चीजका उत्पादन नहीं करते, ना ही कोइ सेवा बेचते है। मुफ्तमें प्रजाके पैसे से मजा करते है। एक साधू के पीछे कमसे कम हररोजके ५० रू. खर्च होता है ऐसा मान ले , क्यूंकी ये साधु भूखे नहीं रहेते है।  पैसे कौन देता होगा? ५० रू. से ज्यादा खर्च करते होगें क्योंकी बीडी और गांजेका खर्च कौन देता होगा? उनके खानेका, चायका, दूधका, भगवे वस्त्रका, फलाहार इन सबके लिए वो लोग तो कमाने जाते नहिं है। तो इनका रोजका सादा हिसाब भी गिने तो एक साधुके पीछे ५० रू. के हिसाब से गिने तो ५० लाख साधुओंके पीछे हररोजके २५०० लाख रपिया हुआ। और सालके ३६५ दिनके ९१२५ करोड रूपिया खर्च होते होंगे। ये तमामपैसे प्रजाकी जेबसे जाते है। ये हिसाब तो सीधे सादे फेमस नहीं है एसे साधुओंका खरच जो आम जनताके सिर पे आता खर्च है।जानेमाने गुरुओं तो जनताके करोडो रूपिया एंठते होगे, कुछ भी किये बिना। भारतकी इकोनोमीके लिए बोज है, ये साधू  संस्था। जो देशके विकासमें कोइ काममें नहीं आती। बिना साधुओंके देशका विकास अच्छा होगा, इकोनोमी सुधरेगी। जनता के महेनतके पैसे बचेगें.
               जिसको काम करना नहीं है वो ही भगवे वस्त्र पहेनके साधु बन जाते है। उनका काम हो गया उनको जिंदा रखनेके जिम्मेदारी जनताकी। बहोत  सारे लोग कहेते है की दो चार साधुके कारण सारी साधु संस्थाको बदनाम नहीं करना चाहिए। मेरा कहेना है की दो चार अच्छे साधुओंके कारन पूरी निष्क्रिय साधुसंस्था का बोज क्युं उठाना? स्वामी विवेकानंद जैसे सच्चे साधु और गुरु कितने? और जो सच्चे है वो तो संसारमें रहेके भी भक्ति कर शकते है। पूरा ॠषि जगत शादीशुदा थे। कितने को तो दो पत्नीआं भी थी| कोइ कोइका मानना है की ये साधुओंको स्त्रीआं विचलित करती है। पर विचलित हो जाए एसी साधुता किस कामकी? या फिर सत्रीओंकी भावनाओंको बहेलाके साधू  खुदकी दबाइ हुइ छूपि वासनाको संतोषते तो नही है ना?     
      
                  एक ही रामकथा को बारबार कहे के करोडो ऋपिया जमा करनेवाले बापुओंकी कमी नहीं है ये देशमें। ज्यादा मंदिरो बनाके जनताके करोडो रुपिया पथ्थरोमें डालते है। एक सोमपुरा फेमिलीका भला करने के लिए बाकी जनताकी जेब से पैसे खाली होते है। ये सोमपुरा फेमिली मंदिर नहीं बनायेंगे तो दूसरा काम ढूंढ लेंगे, भूखे नहीं रहेंगे। उनकी कारीगरी मंदिरो के बजाय सोसायटी या एपार्टमेन्ट बनानेमें उपयोग करेंगें। मजदूरोंको काम मिलता रहेगा।
कुंभके मेलेमें गंगा नदीमें स्नान करते वक्त लाखों साधुओंकी फोटो खुशी खुशी छापते है। और शिवरात्रीके वक्त गांजा पीते साधुओंके फोटो भी अखबारवाले छापते है सौर पुण्य कमातेहै। लोग भी खुश होते है, कैसा महान देश है हमारा। दोचार बुद्धु गोरे आ जाये तो लोग ज्यादा खुश हो जाते है, कैसी महान संस्कृति!!! साक्षर लोग  फटाफट लिखते है की एसी महान साधु संस्था है हमारी की गोरे भी मानते है। एक साक्षरने तो लीख दिया की पश्चिमके लोग अपनी संजीवनी विद्यामें विश्वास रखते है। कोमामें चले जाते है वो वापस होशमें आते है पर मरा हुआ जिवित हो सकते है? कोमामें गया  होशमें आता होगा और मानते होगेंकी संजीवनीके प्रयोगसे जिन्दा हुए।
            
              समजनेकी बात है जहां चोरी ज्यादा होती है वहां पुलिसकी जरुरत ज्यादा रहेती है। एसा जहां अधर्म ज्यादा वहां धर्मकी और साधुओं,गुरुओंकी जरूरत ज्यादा।  चोर अपना धंधा चालु रखनेके लिए पुलिसको भ्रष्टाचारी बनाते है,एसेही अधर्म चालु रखनेके लिए साधु, गुरुको भ्रष्टाचारी बनाना पडता है या बनना पडता है। चोर ही पुलिस बन जाए तो किसीको पकडनेकी चिंता ही नहीं।  अधर्मी और कामचोर साधु,गुरु बन जाए तो  सच्चे गुरु खो जाते है। अभिनयके निष्णात गुरु सच्चे गुरु होनेकी एक्टींग करेंगे, प्रवचन देगें, ह्रदयद्रावक कथाए कहेंगे और भोली जनताके करोडो रूपिया आश्रमो बनानेमें लगायेंगे| बादमें उनके लिए झगडे होंगें, खून भी हो जाते है। ये साधुसंस्था देशके लिए नुकशानकारक है। गुरुगुलामी मानस  प्रजाके लिए ज्यादा नुकशानकारक है।*

ब्रह्मचारी किसे कहेते है?

 ब्रह्माध्ययन संयुक्तो ब्रह्मचर्यरतः सदा॥
सर्व ब्रह्मेति यो वेद ब्रह्मचारी स उच्यते॥५१
श्लोकार्थः ब्रह्माध्ययन से युक्त, सर्वदा ब्रह्मचर्यमें प्रीति रखनेवालेके लिए सर्व ब्रह्म है,एसा जो जानता है वो ही ब्रह्मचारी कहेलाता है।                   
    
      आध्य जगदगुरु शंकराचार्य एक महा ब्राह्मिन थे|उन्होने हिंदु धर्ममेंसे बदीओंको हटानेके लिए खूब महेनत की थी। छोटी उमरमें ही देवलोक  हुए थे। उस समयका भारत मतलब जगत। भारतके, जगतके सभी पंडितोको हराया था। एक मात्र महा पंडित मंडन मिश्र बचे थे उनको भी हराया, पर उनकी धर्मपत्नी महा विदूषी ने प्रश्न उठाया की में उनकी अर्धांगीनी हुं तो मुझे हराओं तो ही हार मानी जाय | ओर बालब्रह्मचारीको कामशास्त्रके विषयमें प्रश्न पूछे| बालब्रह्मचारीने थोडा समय मांगा ओर उसमें ज्ञाता बनके पंडित पत्नीको भी हराके जगदगुरु कहेलाए| किस तरह ज्ञाता बने वो एक रहस्यमय कहानी है।     
   कुछ टीकाकार ब्रह्म अध्ययनकी जगह वेद अध्ययन कहेते है। शायद वेद ही ब्रह्म अध्ययन हो एसा मानते हो। पर शंकराचार्य वेदोके ज्ञाता थे। उन्होंने वेद अध्ययन शब्द ही क्यू नहीं  कहा? दूसरा उसमे शंकराचार्यने कहीं स्त्री शब्दका उल्लेख नहीं किया है और नही कहा है की स्त्रीसंग से दूर रहो. पर शायद टीकाकार खुदकी ही मान्यताओं को थोपते हो।    
   सदाचार का मतलब क्या है? अच्छा आचरण करना एसा सादा अर्थ है। किसीको तकलीफ ना दे एसा आचरण| महापुरुषोके आचरणको देखके एसा आचरण अपनाओ या  खुद ही अंदरसे जाग्रत हो के सर्व ब्रह्म है एसी अनुभूति करके ज्ञान प्राप्त हो जाए,ओर अपनेआप आचरण बदल जाये।
   महापुरुषोका आचरणकी नकल एक उपाय है,दूसरा खुदकी  अंदरसे जागृतिसे सदाचरण आना। चाहे बहुत सारे साद आचरण के  श्लोकोका पठन करो फर्क नहिं पडता बल्कि एसा हो शकता है की खंडित व्यक्तित्व हो जाए। एक उदाहरण देखते है भगवान महावीर  एक चींटीको देखकर उसको बचानेके लिए कूद गये। उनहोंने ये जाना है की सर्व ब्रह्म है ओर उसका अनुभव भी किया| इसलिए वो किसीको भी दुःख नहीं दे शकते। अब जैन क्या करेंगे? चींटीको देखके कूद जाएगें,चींटींके दरमें आटा डालेंगे पर व्यवसायमें किसीकी जेब काटनेमें उन्हें ब्रह्म नहीं दिखेगा या जीव नहीं दिखेगा। ये अकेले जैनोकी बात नहीं है हरेककी है। बहुत सारा दान देना, पशुओंके लिए पांजरापोल खोलेगें ओर दूसरी ओंर बेंकोसे करोडो गरीबोंके पैसे ऐंठ लेनेमें उनका जी नहिं हिचकिचायेगा।
    *दूसरी एक नकलकी बात भगवान महावीर १२ साल तप ओर साधनामें रहे तब एक चींटीमें भी ब्रह्मकी अनुभूति हूइ थी। इन १२ सालमें भोजनके कुल दिन गिने तो एक साल ही भोजन लिया था।मानो की   उन्होंने तय किया की मै भिक्षा तब लूंगा जब कोई  लाल कपडे पहेने हुइ स्त्री हो, जिनके हाथमें नन्हा बालक हो, पासमें सफेद रंगकी गाय हो तो हि भिक्षा लूंगा नहीं तो वापस आ जाऊगा। एसी परिस्थिति कब हो? जब तक एसी परिस्थिति ना हो तब तक उपवास किये। एसी शक्यताए १२ सालमें एक सालके दिन जैसी ही हुइ थी मतलब की ३६५ दिन ही भोजन प्राप्त हुआ। अब आजके महाराज क्या करेंगे? एसा नियम तो ले लेंगे ओर भक्तोंको पहेले से एसी शक्यताओंकी व्यवस्था करने के लिए बोल देगें। सब कुछ तैयार ओर महाराजसाहेब आके ये देखके भिक्षा लेके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेंगें। ये तो दंभ हुआ ना? ये आचरणकी नकल हुई इसका क्या अर्थ हुआ? 
 
         *महावीरनी अहिंसा अंदरकी जागृतिके कारण थी जैनोकी नहीं होती॥ भगवान बुद्धकी करूणा अंदरकी जागृतिके कारन थी। अपनी नहीं हो शकती॥ महापुरुष कहेते है की क्रोध नहीं करना चाहिए। अगर हम क्रोध  करना बंद करते है तो क्या होगा? क्रोध अंदर इकठा होगा॥ छोटी छोटी बातों की निराशा क्रोधके स्वरूपमें इकठी होगी। छोटी छोटी अवहेलना क्रोध बन जाएगी बहार से शांत ओर अंदर से जवालामुखीके रूपमें एनर्जी जमा होती रहेगी। ओर एक दिन छोटे से बहाने मिलने पर जवालामुखी फटेगा। मेरा एक मित्र है हमेशा शांत, सदा हंसते रहेते है, सबको हेल्प करते रहेते है, बहार से बहुत अच्छे लगते है. पर हररोज जोबमें ब्रेक में रातको २ बजे चूपके से छुपाया हुआ शराबका पेग मारते है, ओर बादमें अंदर भरा हुआ क्रोध बहार निकलता है। सबके साथ झगडते है ओर उग्र बन जाते है। बादमें ओफीसमें जाके सो जाते है फिर चार बजे जागते है तब फिरसे सरल ओर शांत हो जाते है।
     चलो हम दुर्गुणोसे बचनेके लिए जंगलमें चले जाते है पर वहां भी क्रोधित होने का कोइ चान्स नहिं है। और वापस भीडमें आते है तब अचानक किसीका  पैर पांवपे  पड गया तो गुस्सा आ जाए तो वर्षोकी साधना नाकमयाब रहेगी। एक गुरु ओर उसका शिष्य जा रहे थे रास्तेमें नदी आइ| वहां एक स्त्री नदी पार करने के लिए खडी थी उसे तैरना नहीं आता था। इसलिए वो राह देख रही की कोइ उसे नदी पार करवाऍ। गुरु तो ब्रह्मचारी थे स्त्रीके सामने देख नहीं शकते तो छू कैसे शकते? गुरुने मना कर दिया, पर शिष्यको दया आ गइ उसने  उस स्त्रीका हाथ पकडके नदी पार करने लगा पर पानी ज्यादा गहेरा था इसलिए शिष्यने उस स्त्रीको कंधे पे उठा लिया। ओर नदी पार करवाइ।गुरु शिष्य फिर आगे चले। पर गुरुको चैन नही आया| गुरुको लगाकी शिष्यने गलत किया, स्त्रीका हाथ पकडा और उठाया भी, महापाप हो गया। ब्रह्मचर्यका भंग हुआ। आश्र्म पहुंचने तक शिष्यको डांटा की तुम्हें उसे कंधे पे उठाने की जरूरत नही थी शिष्यने उत्तर दिया की हे! गुरुजी मेंने तो  उस स्त्रीको नदी पार करने के बाद तुरंत उतार दिया पर आप तो अभी तक उठाके घूम  रहे हो। इसे कहेते है बाहरी आचरण।
             हम भारतीय सदाचारके श्लोकोमें ही खोये रहेते है। हमेंशा ब्रह्मचर्यकी बातें करते है, स्त्रीओके दुश्मनकी तरह बर्ताव करते है। क्या स्त्रीओमें ब्रह्म नहीं है? कुछ संप्रदाय वाले स्त्री के मुख तक नहीं देखते|सेक्स को गाली देते ही जाते है|  और सेक्स अंदर ही सप्रेस्ड होता है। थोडा सा चान्स मिला और सेक्स बाहर। बसमें या कहीं भी स्त्री पासमें बैठी तो परेशान करना चालु। मात्र स्पर्श तो ठीक स्त्रीका वस्त्र भी शरीरको छूये तो भी विहवळ हो जाते भारतयोकी सदाचारकी बातें सुनके हंसी आती है| ब्रह्मचर्यका कठिन पालन करेंगे और बादमें कीसी स्त्रीभक्तके प्रेममें फंस जायेंगे। जैसे नित्यानंद फंस गये। किसीने बिपशा बसुके स्तन पर भीडका फायदा उठाके हाथ फेर लिया। एसे है ब्रह्मचर्यके  फायदे।     
    उपरके श्लोकमें शंकराचर्यने कहीं पर भी स्त्रीका उल्लेख नहिं किया| ब्रह्म मे विहरना मतलब ब्रह्मचर्य| सदाय ब्रह्ममें रत रहेनेवाला, मग्न  रहेनावाला, सर्व ब्रह्म है एसा जाननेवाला ब्रह्मचारी माना जाता है। क्या स्त्रीमें ब्रह्म नहीं है? एक नन्हीं बच्चीमें ब्रह्म है एसा मान नहीं सकते? क्युं बेचेन हो जाते है? क्युं की अंदरसे सर्व जीवमें या निर्जीवमें शंकराचार्यकी तरह ब्रह्म नहीं दिखता। जो लोग सेक्स को दबाते है वे  लोगों ही ननहीं बच्ची पर रेप करते है। बच्चीमें बच्ची नहीं पुख्ता  स्त्री दिखाइ देती है इस  लिए बलात्कार कर सकते है । और बादमें मार भी  देते है। जो साधु स्त्री का मुहं तक नहीं देखते नन्ही एक साल की बच्ची तक का मुंह नहीं देखते,वो  नन्हीं बच्चीमें बड़ी  स्त्री को देखते है,उनके सामने अपनी बच्ची को मत ले जाओ। दूर रखो नन्हीं फूल जैसी बच्चीओंको। नन्हीं बच्चीओं पर बलात्कार करनेवाले  क्रिमिनल्स और ऐसे साधुओंमें तात्त्विक रूपसे या मानसिक रूपसे कोइ फर्क नहीं है। चाहे वो लोग अपने पंथके हितमें बलात्कार ना करे फिरभी उनकी बूरी नजरोंसे भी बचाना चाहिए।
      १६०००रानीआं पटरानीआं, महारानीआं  और प्रेमिकाए रखनेवाले श्री कृष्णको मुक्त महापुरुषोने ब्रह्मचारी कहा है। क्या ये सब अज्ञानी थे? आजके साधु या बाबा कहेत है वो सच की मुक्त महापुरुषोने कहा है वो सत्य? कि शंकराचारय कहेत ये वो सही?      
    पहेले अंदरसे जगृत बनना चाहिए। सर्व चीजवस्तु मात्र, जीवमात्रमें ब्रह्म है ये जानना चाहिए। किसी सदाचारकी नकल नही करनी पडेगी। अंदरसे ही सदाचार आ जायेगा। फिर  आप किसीकी जेब काट ही नही सकते। किसी चींटीको मार नहीं सकोगें या उसे देखके कूदना नही पडेगा अपनेआप हो जाएगा। किसी टेक्सकी चोरी नहीं कर पाओगें, भाव ज्यादा नहीं ले पाओगें, कमतोलमाप में चीज नहीं देगें, किसी पर बलात्कार नहीं कर पाओगें, किसीकी उपस्थिति आपको विचलित नहीं कर सकेंगी। सर्वमें ब्रह्म देखेंगे तो किसीको दुःख नहीं दे सकोगें। शंकराचार्यने सभी श्लोक ब्रह्म को जाननेके बाद लिखे है।              
     तो फिर क्या करना चाहिए? सदाचारका आचरण नहीं करना चाहिए? जरूर करना चाहिए। किसीको अचानक तकलीफ क्यूं देनी चाहिए? पर साथ में ध्यान भी करना पडता है। ध्यान ही एक मात्र उपाय है। किसी सदाचारकी नकलसे ब्रह्म नही जान सकतें। अंदरकी जागृतिके लिए ध्यान करो कोइ व्रत या जप तप की आवश्यकता नही है। ध्यानसे ही धीरे धीरे अंदरसे शांत होते जायेगें और बाहर सदाचार आता रहेगा और बढता जाएगा। पता भी नहीं चलेगा।  जे. कृष्णमूर्ति उसे चोइसलेस अवेरनेस कहेते थे । एक साक्षीभाव जागता है, अनासक्त योग पेदा होगा अंदरसे शांत होने से काम(सेक्स)के प्रति रसकम होगा। क्रोध कम हो जायेगा। सबमें ब्रह्म है एसी प्रतितीसे प्रेम और करूणा बढेगी॥ तो बाबा साधु लोगोंने गलत मतलब निकाल दिया की कामसेक्स से दूर रहेना चाहिए। पर ये बाबा साधु तो काम(वर्क)से भी दूर रहेने लगे। गांधीजीने काम-सेक्सको जितनेके प्रयास बहुत सारे किये पर ध्यानको महत्व नहीं दिया और बुढा काम को बिना जीते चले गए। बाह्य सदाचरणसे पाखंडी बन जाते है अगर साथमें ध्यान नहीं किया तो|

What is Love?(प्रेम पुराण),,,,,,,,,प्रेरणामूर्ति मीरां.

       What is Love?        

         मेरे एक परम मित्रने सवाल किया की प्रेम क्या है?लव के बारे में कुछ लिखो| मेरे जैसे उग्र लिखने वालेको एसा सवाल? पर क्या करे फरमाइश पूरी करनी ही पडेगी। शायद उनका मक्सद होंगा की  थोडे समयके लिए उग्रतासे कोमलता तरफ जाउं। ब्लोगाचार्य कहते है की ललितभाव जागने चाहिए। प्रेम शब्दकी बात आती है तो पहले  ख्याल मुझे मीरां का ही आता  है। मेवाड की  मीरांबाई(ई.स. १४९८-१५४७). मीरां राजकुंवरी थी। मेडताके राजा रतनसिंह राठोड्की बेटी थी। जोधपुर शहेरको बसानेवालेके वारिश  थे। मीरांकी शादी चितोडके महाराणा सांगा के बेटे भोज के  साथ हुइ थी। ये महाराणा सांगाने बाबर के साथ युद्ध किया था। सबसे बडे बेटे कुंवर भोज उस युद्धमें मारे गये। पर मीरां मनसे कृष्णको अपना पति मानती थी उस लिए वो विधवा नहिं हुई। लोहीकी सगाईमें मीरां जगविख्यात महारणा प्रतापकी बडी काक़ीमा थी। कुंवर भोज महाराणा प्रतापके पिता उदयसिंहके बडे बाई लगते थे। ये उदयसिंहके कारण सबसे ज्यादा सुंदर शहर उदयपुर मिला। विदेशी सहेलानीयाओंका एक सर्वे हुआ था उसमें भारतका सबसे श्रेष्ठ शहर धूमने के लिए उदयपुर पहेले नंबर पे है।
प्रेमदीवानी मीरां, दर्ददीवानी मीरां ईतिहासकी एक अमर छवि  है। मीरां जब छोटी लडकी थी तब कीसी महेमान साधुके पास एक श्री कृष्णकी मूर्ति थी. बालमीरांको वो मूर्ति पसंद आ गई। मीरांने साधुसे वो मूर्ति मांगी पर साधुने देनेसे इन्कार किया और चल दिया। पर साधुके अचेतन मनमें मीरांका मूर्तिके प्रति जो प्रेम अंकित हो गया होगा। इसलिए साधुके अचेतन मनको चेन नहीं हुआ उसे सपने आने लगे और साधुने वापस आके मीरांको वो मूर्ति दे दी। और तबसे मीरां कृष्णकी दीवानी हो गई। कृष्णकी भक्तिमें मग्न हो गई। मीरांबाईने जिंदगीके आखिर के दिन द्वारिका(गुजरात) में बिताएं।
 
        *मूर्ति तो एक बहाना था। प्रेम तो मीरांके अंदर कूट कूटके भरा था। मूर्तिके बहाने बाहर आया। मीरां प्रेममय बन गई। मूर्ति कृष्णकी थी वो कृष्ण तो ५००० साल पहेले हुए थे। मीरांने कहां कृष्णको देखा था? राधाने तो कृष्णको देखा था। फिरभी कृष्णने एकबार गोकुल छोडा बादमें कभी वापस गोकुल नहिं गये थे। अगर प्रेम आपके अंदर है तो कृष्ण तो एक माध्यम है। आधुनिक युगमें क्या मीरां हो शकती है। अगर कीसीको मालूम हो तो बताएं।

           *सती किसको कहेते है। सामान्य पुरुषके प्रति असीम प्रेम हो और उसके बिना जीना दुस्वार हो जाए। कोमन  पुरुष तो बहाना है। सतीके अंदर ही प्रेम कूट कूटके भरा होता  है। जला देने से कोई सती ना बन जाए। धार्मिक या सामाजिक दंभीओंने लाखों स्त्रीओंको भारतमें एसे ही जला दी है। हुण लोग बहारसे आये और सती होने की परंपरा ले आये| ये एक बडी दिमग अंग्रेजोके कारण नष्ट हुई। थेंक्स टु ब्रिटिशर।
      *प्रेम हजारों लाखों फूलों की सुगंघ है| फूल ये नहीं कहेता  की मै मेरी महेक कीसी एक  को हीं दूंगां। फूल ये नहीं कहेता की मेरी महेंक सिर्फ उसके लिए है और इसके लिए नहीं है। सिर्फ एक शर्तमें प्यार हो गया व्यापार| प्रेम मुक्ति है। बंधनमें बंध जाए तो मोह बन जाए। गुजराती लेखिका वर्षा पाठकने लिखा है ‘मुझे बेटेको श्रवण नहीं बनाना है। बेटे को श्रवण बनाके रखनेवाली माता मोहवश है, प्रेमवश नहीं है| कभी बेटेको ‘राम’ भी मत बनाओं। राम बनानेवाले पिता अहंकारग्रस्त है। पिताको आज्ञापालक संतान अच्छी लगती है। पिता भगवान नहीं है। वो भी अयोग्य मांग रख सकते है। बच्चो के  प्रति मोह कब तक रखोगें? ये शिखना है तो प्राणीओं से शीखे। में शीखा हुं एक चित्तेके जिवन कवनको टीवी पर देखकर। संतानोको मोहसे मुक्त रखकर सारी जिंदगी प्यार करने से कौन रोकता है? जन्म देकर उनके मालिक बननेका कौन कहेता है? प्रेम मे मालिकी भावही प्यारका सत्यानाश करता है। पुत्रकी शादी होते ही माताको लगता है की २५ साल तक मेरा था अब कीसी ओर का हो गया। साडीका पल्लु पकडनेवाला अचानक अब दुपटेके पीछे घूमेगा। फिर दोनों और का मालिकीभाव शुरु। बेटेकी अंगत जरूरतको माता पूरी कर सकती है क्या ? प्रेम मुक्त करता है और मोह बंधन देता है। मोह शुध्ध  बने तो  प्रेम और प्रेमकी अशुद्धि मोह। प्रेम जीनेकी ताकत देता है, मोह जीना दुस्वार कर देता है।
   

      * प्रेम कीसीको दुःख देने के प्रयास नही करता पर मोह और मालिकीभाव कर सकता है । जब कोइ साक्षर या चिंतक रामायणको प्रेमका महाकाव्य कहेते है तब मुझे गुस्सा आता है, हंसी भी आती है । लक्ष्मण बन्धुप्रेममें मग्न था । पर लक्ष्मणको तो ठीक राम जैसे महापुरुषको भी उर्मिलाका ख्याल क्यूं नहीं आया?  सबसे ज्यादा महान प्रेम तो उर्मिला का हुआ । प्रेममें बेटेको वनवास कैसे दे सकते है? हम बेटेको उनकी मनपसंद केरीयरमें पढने ना देकर  और उसके स्वप्नोको ना पूरा करके चौदाह सालकी जगह पूरी जिंदगीका वनवास देते है । प्रेममें अग्निपरीक्षा? प्रेम और त्याग प्रिय पत्नी  का? प्रेमका महाकाव्य? हा!!हां!हां!ह!!!! कौन ज्यादा  बलिदान देता है और सदीओं तक बने रहे ,ऐसे बलिदान लेने देनेकी जैसे स्पर्धा लगी है । ऋषि पत्नी अरुंधतीने प्रण लिया था की रामके द्वारा  त्यागी हुई सीताके बिनाकी अयोध्यामें  कभी पांव नहीं रखुंगी। प्रेम परोक्ष रुपसे किसीको दुःख नहीं देता। ईसलिए कहेता हुं की अहिंसा सिर्फ भगवान महावीरकी। करुणा सिर्फ भगवान बुद्धकी और प्रेम सिर्फ मीरांका । 
 
        *सहानुभूति, सिम्पथी प्यार नहीं है । वो तो एक सामाजिक व्यवहार है। सहानुभूतिको अगर प्रेम माना तो दुःखी होंगे। फिर बारबार सहनुभूतिकी जरुर रहेगी। बीमारको सहनुभूति ज्यादा मिलती है और अच्छि भी लगती है। सगे संबंधी, पतिदेव, बेटे-बहु सब आसपास जमा होंगे। फिर ये दुष्चक्र चलता रहेगा। जैसे किसीने नोटीस करना बंद किया, तो हो गए बीमार| फिरसे सब जमा। हररोज सब लोग हाल पूछने लगेगें। अच्छा लगने लगेगा। बीमारीमें रस लेने लगे तो गये कामसे। जरासा किसीने ध्यान नहीं दीया हो गये बीमार। प्रेम जीनेकी ताकत है और सहानुभूति बीमार रहेना शीखाता है। ये एक मनोविज्ञान है। भारतमें मनोविज्ञान नहीं शिखाते| अमेरिकामें कोलेजमें किसी भी कोर्समें कुछ सायकोलोजी कम्पलसरी पढनी पडती है।
     

        * ध्यान, नोटिस ये सब मनकी  खुराक है। घरमें महेमान आते है तो बच्चोंको नोटिस नहीं करेगें तो बच्चे मस्ती करेगें या जोरसे बिना कारन रोने लगेगें या खाना मांगेगें। पूरा दिन औरते पासपडोशमें गप्पें लगायेगी, टीवी पर सांसबहूके झगडेवाली सिरियल देखेंगी या माताश्रीके या सहेलीओंके साथ फोनमें बातें करेंगी और जैसे ही पतिदेवके आनेका समय हुआ की सिर पकडके विक्स लगाके सो जाएगी। पतिकी सहानुभूति चाहिए। पति चिंतित हो जाए तो मजा आ जाए। थोडे आगेपीछे घूमे  तो अच्छा लगता है। सिरदर्द गायब। जेन्युइन बीमारी के सिवा ज्यादातर बीमारी सायकोसोमेटिक-मनोशारिरीक होती है।  परीक्षाके वक्त ही बच्चोंको शरदी जुकाम हो जाती है, बुखार आता है॥ ये सब अचेतन मनकी करामत है। चाइल्ड सायकोलोजी सभी माबाप को पढनी ही चाहिए।   अमेरिकामें तो pet सायकोलोजी मतलब पालतू जानवरकी सायकूलोजी भी पढाते है । सहानुभूतिको  प्रेम मानते हो और बारबार बीमार हो जाते हो तो जरा सोचना सहानुभूति पानेकी आदत तो नहीं हो गइ ना? बारबार बीमार रहेते हो और डोक्टर अशक्त  होने की बात करे और कुछ निदान ना करे और शक्तिकी या एन्जाइम या पाचनकी दवायें दे या केलशियम-आयर्न की गोलीयां दे तो समज जा ना की सहानुभूति पानेकी आदत बन गइ है। हररोज विक्स लगानेकी जरुर लगे तो समजना सहनुभूतिकी आदत हो गइ है।
     
                सहानुभूति को प्रेम समजनेकी भूल मत करो| मेरे पिताश्रीको हार्ट एटेक आया था। गांधीनगर (गुजरात) की सिविल होस्पिटलमें दाखिल किया था। पूरा गांव खबर पूछने आया था । बहुत भीड हो गइ थी॥ तब डोक्टरने मुझे एक बात कही थी। ये सब सिर्फ अपनी हाजरी देने आये है। कई लोगोंको हाजरीपत्रक भरवानेकी मजा आती है। कोइ अगर किसी कारनवश ना आ सका तो वो ध्यानमें लिया जाता है। एक आप ही नहीं आये थे एसा कहेके गिल्टी फिल कराते है। अगर इसकी आपको  आदत पड गइ तो समझ लो आप हाजरीपत्रक भरने के लिए बीमार पडते है। कइ लोगोको आदत होती है हररोज रातको या सुबहको पत्नीके पास पैर दबवानेकी या बदन मसलवानेकी। उसकी खास आवश्यकता नहीं होती है पर सेवाकी आदत हो जाती है। हररोज पैर दुःखे तो डोक्टरसे सलाह लेनी चाहिए।
    
                  प्रेम मुक्तिका मार्ग है। मोह बंधन का और सिम्पथी  बीमारीका| दो आत्माके बीचका मिलन प्रेम है। दो शरीरके बीचका मिलन काम(सेक्स) है। दो आत्माओंके साथ दो शरीरका मिलन समाधि है। शायद वो समाधि क्षणिक हो पर व समाधि ही है। बारबार समाधिमें उतरके नित्य युवा रहेने के भरपूर होर्मोन्स पा सकते  है। बहुत सारे रोगो दूर हो जाते है। मन प्रफुल्लित रहेता है, स्ट्रेस कम होता है। स्त्रीओमें इस्ट्रोजन लेवल बढनेसे स्त्रीत्वमें वृद्धि होती है और पुरुषोमें टेस्टाटोरिन  लेवल बढने से पुरुषत्वमें वृद्धि होती है। इसलिए समाधिमें उतरने की बातमें कंजूसी नहीं करनी चाहिए| इसी सायन्सको नहीं समजनेवाले साधू बाबा  गुरुओकी बातें माननी नहीं चाहिए।
 
                        ये प्रेम पुराण कथा भगवान विष्णूजीनेस्वयं हमें बताई थी| फिर हमने मुनि  श्री फ्रोइडको सुनाइ। मुनि फ्रोइडने हमारी आज्ञासे मुनिश्री एडलर, कार्ल जुंग(युंग), डो. मृगेश वैश्णव(अहेमदाबादके) को सुनाइ । या तो सभी मुनिश्रीओ द्वारा हमने सुनी हो ऐसा भी हो सकता  है। क्योंकी हम  अहं ब्रह्मास्मि में मानते है। ये सब मनोवैज्ञानिक मुनिश्रीओ ब्रह्म है| हम भी ब्रह्म है। आप सर्वे वाचकगन  बी ब्रह्म है। शायद विस्मृतिके कारन भूल गये हो इसलिए   फिरसे कहेनी पडी। इतिश्री राओल रचित प्रेमपुराणका प्रथम अध्याय समाप्त| ये प्रेमपुराणका नित्य पाठ करने से घरमें आधि,व्याधि,उपधि नष्ट होती है। घरमें बीमारी नहीं आती। बच्चे स्वस्थ रहेते है। इसलिए पैसे व्यय नहीं होते। लोगोंको घरमें ही समाधिका अनुभव होता है। और गुरुओके पास जान नही पडता। बाबा  गुरु भूखों मरेगें पर देशको तो लाभ होंगा|

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