पावागढ(गुजरात) के राजा पताई और माताजी का पल्लू|

            पावागढके राजा पताई के बारेमें लोगोंमें गलतफ्हेमी आज भी है. पताई राजा पृथ्वीराज चौहाण क वंशज पावगढका लोकप्रिय राज था। मातजीका परम भक्त था और महाकाली मां के दर्शन के बिना पानी भी नहीं पीता था। अब समजने की आत ये है की जब महमद बेगडाने पावागढके किल्ले को जितनेके कडे प्रयास किये, फिर भी पावागढके अजेय किल्ले को जितने में बारबार नाकाम्याब रहा। पावागढका भौगिलिक स्थान ही कुछ ऐसा था। किल्लेमें प्रवेश करनेके गुप्त मार्ग मिलने पर ही सफल होना मुमकिन था । और राजा अगर प्रजा को प्रिय हो तो कोइ गद्दार मिलना मुश्किल होता है।

          अब समजने की बात ये है की मातजी कोइ व्यक्ति नहीं है. शक्ति और स्त्रीत्वका एक प्रतिक मात्र है। उनकी पूजा करना मतलब उनका बहुमान आभार व्यक्त करनेकी रीत है. एनर्जीका सही उपयोग ही माताजीकी भक्ति है। अब महमद बेगडेने राज रमत करके शीघ्र कविओंके पास कविताएं बनवाई और गरबा की रचना करवाके माताजी को गरबा खेलने आये और पताई राजाने माताजीका पल्लु हाथमें लिया। अब जो लोग माताजीके परम भक्त है और माताजीके दर्शन किये बिना पानी तक ना पीए व क्या ऐसा कर शकता है भला? और पहेले तो माताजी कोइ व्यक्ति बनके गरबा खेलने आ शकते है? माताजीने श्राप दिया ऐसा अंधविश्वास कविओं और वार्ताकारोंने फेलाया और पताई राजाको चारित्र्यहीन साबित कर दिया.लोग पताई राजाके विरोधी हो गये और मानने लगे की राजाका पतन होना चाहिये । इस्लिए गुप्त रास्ते महमद बेगडेको बता दिये और पावागढका पतन हुआ और उनके वंशज भाग गये और आसपासमें छुप गए बादमें जब मौका मिला तो फिरसे अपने राज्यकी स्थापना की। देव्गढबारियाकी स्थापना पताई राजाके वंशजोने की थी।. वहांके महाराजा जयदीपसिंह लोकसभाके उम्मीदवार थे। स्पोर्ट अथोरिटीके चेरमेन थे, जयपुरकी राजकुंवरी के साथ उनकी शादी हुई थी।
 

            ऐसी ही एक और गेरमान्यता है की जब महमद गजनी ने सोमनाथ पर चडाई की तब ब्राह्मिनोने कहा की शिवजी तीसरा नेत्र खोलेगें और सब भस्म हो जाएंगे। सब शिवलिंगको बचाने के लिए लिंगको लिपट लिपट कर कटके मर गये पर किसीने तलवार नहीं उठाई. पथ्थरको भगवान मानना बूरा नहिं है। पर पथ्थरका लिंग जो मेल जेनेटल अंग और जलाधारी पार्वतीकी योनिका प्रतीक है, सर्जन का प्रतीक मात्र है। उसके पास सबक भस्म करनेकी आशा रखना मुर्खामी है। और एसी अंधश्र्द्धा फेलाने वाले और माननेवाले भी गुनेगार है।

                  लोगोंको जैसे बिना अंधश्रद्धाके चलता ही नहीं ऐसा लगता है। जिने के लिए जैसे कोइ सहारा है किसीके सहारे के बिना जी ही नहीं सकते मर जाएगें । और कभी संतोषी मता तो, कभी दशामा एसे हरबार कोइ कोइ चलता रहेता है। व्रतकथा ना की तो जहाज डूब जाएगें दरियामें और कथा करो तो डूबे जहाज वापस आयेंगें। टायटेनिक डूबा तो वापस क्यों नही आया।
  

                         *सर्वाइवलके युद्धमें जो कमजोर हुआ वो मर गया समजो। कोइ भगवान बचाने के लिए नहीं आयेगा क्यंकी भगवानने ही एसा नियम बनाया है। और भगवानके लिए पृथ्वी पर रहनेवाले सभी जीव एकसमान है। भारतीय ज्यादा प्रिय और दूसरे नहिं एसा नहीं है। इन्सान ज्यादा प्रिय और प्राणी नहीं एसा नहीं है।* कुदरतके लिए सभी एकसमान है। ऐसा ही होता तो गजनी जीतता नहीं. मुस्लिमोने हजर साल राज नहीं किया होता और २०० साल अंग्रेजोने राज नहीं किया होता अगर हम धार्मिक लोग ही ईश्वरको ज्यादा प्यारे

2s टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. राजपूत अल्पेश
    अग 06, 2011 @ 09:33:27

    मै ईस बात से सहमत नही हू॥

    Reply

  2. anandprashad
    मई 29, 2010 @ 06:50:14

    सचाई तो समझ मेनहीं आती पर पंडित प्ररोहित इस कमजोरी ओर अंधी श्रधा के फायदा उठा कर व्‍यवसाय बना लेते है। माता वेष्‍णव,मनसा देवी, संतोषी, काली….न इनका मां है न बाप…भगवान की परिभाषाकिसी मनुष्‍य मात्र कीनहीं है। पर चेतन है भगवता की ये किसी व्‍यक्‍ति मात्र से जोड़ना ठीक नहीं….पाव गढ मैंने देखा है पर ये तिर्थि जैनियों का या दत्‍ता त्रे का है। माता जी न जाने क्हां से अचानक सबसे उच्‍ची चोटी पर आ विराजी।

    Reply

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