28 मई 2010
by Bhupendrasinh Raol
in विवाद
पावागढके राजा पताई के बारेमें लोगोंमें गलतफ्हेमी आज भी है. पताई राजा पृथ्वीराज चौहाण क वंशज पावगढका लोकप्रिय राज था। मातजीका परम भक्त था और महाकाली मां के दर्शन के बिना पानी भी नहीं पीता था। अब समजने की आत ये है की जब महमद बेगडाने पावागढके किल्ले को जितनेके कडे प्रयास किये, फिर भी पावागढके अजेय किल्ले को जितने में बारबार नाकाम्याब रहा। पावागढका भौगिलिक स्थान ही कुछ ऐसा था। किल्लेमें प्रवेश करनेके गुप्त मार्ग मिलने पर ही सफल होना मुमकिन था । और राजा अगर प्रजा को प्रिय हो तो कोइ गद्दार मिलना मुश्किल होता है।
अब समजने की बात ये है की मातजी कोइ व्यक्ति नहीं है. शक्ति और स्त्रीत्वका एक प्रतिक मात्र है। उनकी पूजा करना मतलब उनका बहुमान आभार व्यक्त करनेकी रीत है. एनर्जीका सही उपयोग ही माताजीकी भक्ति है। अब महमद बेगडेने राज रमत करके शीघ्र कविओंके पास कविताएं बनवाई और गरबा की रचना करवाके माताजी को गरबा खेलने आये और पताई राजाने माताजीका पल्लु हाथमें लिया। अब जो लोग माताजीके परम भक्त है और माताजीके दर्शन किये बिना पानी तक ना पीए व क्या ऐसा कर शकता है भला? और पहेले तो माताजी कोइ व्यक्ति बनके गरबा खेलने आ शकते है? माताजीने श्राप दिया ऐसा अंधविश्वास कविओं और वार्ताकारोंने फेलाया और पताई राजाको चारित्र्यहीन साबित कर दिया.लोग पताई राजाके विरोधी हो गये और मानने लगे की राजाका पतन होना चाहिये । इस्लिए गुप्त रास्ते महमद बेगडेको बता दिये और पावागढका पतन हुआ और उनके वंशज भाग गये और आसपासमें छुप गए बादमें जब मौका मिला तो फिरसे अपने राज्यकी स्थापना की। देव्गढबारियाकी स्थापना पताई राजाके वंशजोने की थी।. वहांके महाराजा जयदीपसिंह लोकसभाके उम्मीदवार थे। स्पोर्ट अथोरिटीके चेरमेन थे, जयपुरकी राजकुंवरी के साथ उनकी शादी हुई थी।
ऐसी ही एक और गेरमान्यता है की जब महमद गजनी ने सोमनाथ पर चडाई की तब ब्राह्मिनोने कहा की शिवजी तीसरा नेत्र खोलेगें और सब भस्म हो जाएंगे। सब शिवलिंगको बचाने के लिए लिंगको लिपट लिपट कर कटके मर गये पर किसीने तलवार नहीं उठाई. पथ्थरको भगवान मानना बूरा नहिं है। पर पथ्थरका लिंग जो मेल जेनेटल अंग और जलाधारी पार्वतीकी योनिका प्रतीक है, सर्जन का प्रतीक मात्र है। उसके पास सबक भस्म करनेकी आशा रखना मुर्खामी है। और एसी अंधश्र्द्धा फेलाने वाले और माननेवाले भी गुनेगार है।
लोगोंको जैसे बिना अंधश्रद्धाके चलता ही नहीं ऐसा लगता है। जिने के लिए जैसे कोइ सहारा है किसीके सहारे के बिना जी ही नहीं सकते मर जाएगें । और कभी संतोषी मता तो, कभी दशामा एसे हरबार कोइ कोइ चलता रहेता है। व्रतकथा ना की तो जहाज डूब जाएगें दरियामें और कथा करो तो डूबे जहाज वापस आयेंगें। टायटेनिक डूबा तो वापस क्यों नही आया।
*सर्वाइवलके युद्धमें जो कमजोर हुआ वो मर गया समजो। कोइ भगवान बचाने के लिए नहीं आयेगा क्यंकी भगवानने ही एसा नियम बनाया है। और भगवानके लिए पृथ्वी पर रहनेवाले सभी जीव एकसमान है। भारतीय ज्यादा प्रिय और दूसरे नहिं एसा नहीं है। इन्सान ज्यादा प्रिय और प्राणी नहीं एसा नहीं है।* कुदरतके लिए सभी एकसमान है। ऐसा ही होता तो गजनी जीतता नहीं. मुस्लिमोने हजर साल राज नहीं किया होता और २०० साल अंग्रेजोने राज नहीं किया होता अगर हम धार्मिक लोग ही ईश्वरको ज्यादा प्यारे
27 मई 2010
by Bhupendrasinh Raol
in विवाद
ब्लोग जगतमें कहीं पढ़ा था किसी के अभिप्राय में की अमरीका से हररोज गंदगी भारतमें आती है | शतप्रतिशत सच बात है | उसके लिए कौन जिम्मेदार ? क्या अमरीका जिम्मेदार है ? होगा मेरी ना नहीं है पर ग्लोबल वर्ल्ड के व्यापार जगतमें कितनो को मना करा सकते है | पेप्सी,कोला या फेंटा को निकाल देनेके बाद भी वापस आ गई उसके लिए कोंन जिम्मेदार है हम भी उतने ही जिम्मेदार है |
बरोडामें सिर्फ मेरे घर के सामने ही कोई गंदकी डाले तो में लड पड़ता था | घर के आगे घरमें नहीं |अगर में उस वेस्ट को किसी और काम में ले लेता तो ? तो हररोज लोग मेरे घरके सामने गंदकी डाल जाते | और अगर में उस कचरे के बदलेमें डालने वाले को कुछ रुपये देता तो उन लोगों को और भी मजा आता और भी जगह से भी कचरा लाके मुझे बेचते और पैसे बनाते| अब उसी कचरे को सचीन और अमिताभ साहब प्रमोट करते है तो में ज्यादा से ज्यादा लूँगा और मेरे पडोसी और सचिन और बच्चन सब लोग कितने खुश होके पैसे बनाते और मेरा क्या होता? घाटा, अब पूरी बात को समजे तो उसमे दोष किसका ज्यादा है पडोसी का? या उसी कचरे को अच्छी चीज माँनके स्वीकार किया और उसे प्रमोट करके अपने स्वार्थ के लिए पेसे बनाने वाले तेंदुलकर और बच्चन साहब का दोष? बादमे में आवाज उठाऊ की अम्रीका से हररोज गंदकी भारतमे डाली जाती है उसका क्या अर्थ? उसको लेते ही क्यों हो?
भारत की जनता खुदको ज्यादा बुद्धिमान समजती है तो फिर क्यों ये गंदकी को प्रमोट करनेवालों को हीरो मानती है और उंकी पूजा करती है? बच्चन साब बीमार होते है तो पूरा भारत मानता है की उनके बिना भारत का उद्धार ही नहीं और मंदिरों में जा के पूजा, प्रार्थना करते है | किसी सैनिक या त्रासवाद के सामने लड़नेवाले वीरगति प्राप्त करनेवाले को कोई याद क्यों नहिं करता? संसद पर हुए हुमलेमे मरने वाले की आठवी वरसी में कीसी को वक्त नहिं मिला की उन लोगोंकी आत्माकी शांति की लिए प्रार्थना करने की और उनके परिवार जनको याद करनेकी किसीने परवाह की ? उन लोगोकी श्रध्धानजली के अवसर पर किसी आगेवान नेताको या सचिन या बच्चन साहब को वक्त ही नहीं मिला| सचे हीरो के लिए किसी के पास वक्त नहीं है|
पेप्सी या कोक से बाथरुम-टोइलेट अच्छे साफ़ होते है ट्राय करके देखना| क्यूँ? उसका पी.एच.ज्यादा है| अमरीकामें अगर में सोडा हाथमे लेता हू तो मेरे बेटे मेरे मुझे आँखे दीखाते है| यहां पेप्सी, कोला कोई नही कहेता सोडा कहेते है | यहां मेरा बेटा जो क्रिकेट खेलता है वो कभी भी पेप्सी या कोक नही पीता और मुझे भी नहिं पीने देता | पेप्सि के एक एक घूंट दन्त के इनेमल को नुकशान करता है| तो हमारे लीवर और पेट की क्या हालत होती होगी? अब कोई कितना भी प्रचार करे क्या खाना क्या पीना ये हमें तय करना है| कोई तो जहर भी बेचे को लड्डू हमें तय करना है की क्या खरीदना | सिर्फ एक दिन लोग समजकर पेप्सी-कोला नहीं पिएगे तो? दुसरे ही दिन पेप्सी-कोला की कम्पनी खुद सब कूछ समेटने लगेगी ही और एक हप्ता नहीं पिएगी तो?अपने आप कंपनी वापस चली जाएगी |
कोई हीरो सामने से पैसे देकर कहेगा की मुझे एड में लो फिरभी ना कहेगी और भा गा जाएगी | पर ऐसा होनेवाला तो है नहिं अपने भगवान जाहेरखबरों में से पैसे कमाते है फिर उनका क्या होगा? हम लोग पागलों की तरह क्रिकेट, फिल्म देखते है और जाहेरखबरोंमें से प्रेरणा लेके जंकफ़ूड और कोल्ड ड्रिंक्स खातेपिते है इसलिए तो वो लोग तो पैसे बनाते है | और इसलिए तो एड कम्पनी उनलोगों को करोडो रूपया देती है| इसलिए क्रिकेट खेल से ज्यादा फ़िक्षिंग बन गया है| हम मेंच देखते वक्त हमारा बी.पी. बढ़ाते है एक फोर और सिकस लगायेंगे तो भारत जित जाएगा | पर उन लोगों को किसीकी परवा नहीं होती| हम लोग अगर देखना बंद कर देंगे तो फिक्सिंग अपने आप बंद हो जाएगी.|
जंक फ़ूड को गालीया देते है पर कौन कहेता है की खाओ ? कोई हमको घरसे पुलिश की तरह पकड के नहीं ले के जाता मेक्डोनालड़में ? हम नहीं जाएगे तो वो लोग हमारी राह नहीं देखेंगे और चले जाएँगे | एक पैसेका नुकशान नहीं सहेंगे |
श्री कान्ति भट्ट विदेशी कंपनी कारगिल और मोंसाटो की बात हरवक्त करते है की ये लोग भारतमें हाइब्रिड बिज और बी.टी. ब्रिंजल लाते है और कहते है की उसमे क्वोलिटी या स्वाद नहीं है | बात सही है पर में कहेता हूँ की ऐसा कहेना चाहिए की खरीदो मत और खाओ मत एक सीजन नहीं खाएंगे तो उसके बिना मर नहीं जाएँगे | और उसका असर पड़ेगा | दुसरे सिजनमे बिज खरीदेगे नहीं तो कम्पनी अपने आप चली जाएगी| एक ही सीजन काफी है| पर ये संभव नहीं है क्योंकि सब को ये समजाये कौन ? किसी धर्मगुरु ये कहे की ब्रिंजल खाना पाप है तो ही ये संभव है | पर हो शकता है की वो कम्पनी फिर धर्म्गुरुको ही पैसे दे के चुप कर दे तो ? गुरूजी कहेंगे बैंगन तो खाने चाहिए उससे स्वर्ग मिलता है| श्री कान्ति भट्ट का मै कुछ बातोंमें बड़ा आलोचक भी हूँ |
यहाँ में एक स्पष्टता करना चाहूँगा की तेंदुलकर और बच्चन साहब का नाम पढ़कर कोई अपना मन न दुभाये | ये तो एक एक्जाम्पल है सबके नाम तो कहाँ लिखूं ? तेंदुलकर और बच्चन साहब अपने क्षेत्रमें महान है| पर अनिल कपूर ज्यादा महान है क्योंकि उन्होंने कभी ऐसी एड करके करोडो रुपया नहीं कमाया | शायद उन्होंने कोई एड की हो ऐसा जाननेमें नहीं आया|
सार ये की गंदकी उपयोग आप करते हो इसलिए वो लोग बेचते है लेना बंद करदेंगे तो बेचना बंद हो जायेगा | फीर अमरीका से गंदकी आना बंद हो जाएगी |
जानकारीके लिए पेप्सी कम्पनी के इन्द्रा नूयी भारतके है| उनका २००८ का कुला वेतन १,३३,८२,०३५.०० डोलर था | और आजके १ डॉलर ४६ के हिसाबसे ६१,५५,७३.६१०.०० रूपी होता है | ये आपके लीवर, गुर्दा और दांत बिगाड़नेकी कीमत है| और दुनिया के तीसरे नंबर के पावरफुल लेडी में उनकी गिनती है | पर मुझे उसमें उनका कोई दोष नहीं दिखता दोष अपना है |और हम इस बात का गर्व महेसुस करते है |
18 मई 2010
by Bhupendrasinh Raol
in विवाद, Uncategorized
![images[4]](http://brsinhji11.files.wordpress.com/2010/05/images4.jpg?w=535)
भारतमें वैज्ञानिको की ठीक से क़द्र नहीं होती है| हम भारतीय ही वैज्ञानिको की सही कद्र नहीं करते है तो हम दूसरोंसे क्या उम्मीद रख सकते है| ये वेन्की अगर भारतमें होते तो कोइ उन्हें पहेचानता भी नहीं| एसे और भी बहुत सारे वैज्ञानिक है जिनकी सहि कीमत हुइ नहीं है| ये तो अब्दुल कलाम ही खुशनसिब है जिनको भारतकी जनता जानती है, और वोही सच्चे हीरो होने पर भी हम उस महानुभाव को हीरो मानते नहीं है| बीग बी अच्छे ईन्सान और अच्छे अभिनेता जरूर है पर हीरो नही है| भारतमें नेता-अभिनेताओकी ही कद्र होती है| मिडिया वाले भी अभिनेताओ की प्रशंसामें लगे रह्ते है| इसलिए जनता भी उन्ही लोगों को ही हीरो मानती रहेंगी|
परमाणु विस्फोटके प्रयोगके बाद विदेश से सहायता पर प्रतिबंध लगाया गया था| बहुत सारे प्रोजेक्ट संयुक्त रूपसे अमली करण हो रहे थे| एल.सी.ए. का प्रोजेक्टभी संयुक्त रूपसे था| जिन्हे वैज्ञानिको ने बिना विदेशी सहायता से पूरा किया| भारतके वैज्ञानिको के वेतन के बारेमें प्रेसवाले क्या जानते है? एक पी.एस.आइ. या पुलिस कर्मी से कम वेतन होता है| मिडियाको पहेले ये नेता-अभिनेताको हीरो बनाना बंद करके जूठी प्रशंसा करनी छोडनी होगी| बिग बी के जन्मदिन मनाने के लिए बडी बडी केक पेस्ट्री बनाना और भव्य समारंभो का आयोजन करके उनका सन्मान करने वाले और पूरा न्यूझपेपर उनके ही समाचरों से भरने वाले पत्रकारोंको किसी वैज्ञनिक का जन्मदिन क्युं याद नहीं आता? परमाणु विस्फोट के प्रयोग मे अब्दुल कलामके साथ कई और भी अनामी वैज्ञानिक थे| अब्दुल कलाम डिफेन्स लेब के सर्वोपरि अधिकारी थे,मिसाइल प्रयोग उनके अकेले की सफलता नहीं है|उनका योगदान ज्यादा था साथ में कइ अनामी वैज्ञानिक का भी योगदान रहा है तब कही जाके ये महत्वपूर्ण कार्य सफल हुआ है|
दंभी पत्रकार और मिडियावाले सारा समय नेता अभिनेताके गुणगान गाने में व्यस्त रहेते है और हीरो बनाते फिरते है| वही मिडिया वैज्ञानिकोकी सही कद्र ना होने की फरियाद भी करते है| ये तो भाजपने थोडा अच्छा काम किया अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाया| राजकिय फायदे के लिए रबर स्टेम्प जैसा होद्दा दे दिया| अगर सायन्स जैसे विभागमें केबिनेट मंत्री बनाया होता तो ज्यादा अच्छा होता| ऐसे ही एक गुजरातके नामी वैज्ञानिक साम पित्रोडाने सिर्फ एक रूपिया वेतन लेके राजीव गांधीका हर घरमें हर गांवमें टेलीफोन और एस. टी. डी. पी. सी. ओ. और टी. वी.के नेटवर्कका सपना पूरा किया था| फिर भी राजीव गांधीके बादमें आइ हुइ सरकारने उनको महत्वपूर्ण कार्य ना दे के उन्हें सिर्फ बिठाके रखा|
भारतमें इन्फोटेककी शुरूआत गुजरातसे हुइ पर सबसे आगे बेंग्लोर और बादमें हैद्राबाद, पूना आ गए| इसमे गुजरात पीछे रहे गया| पहेले का सही हिन्दु धर्म सायन्टिफिक था| बादमें आये संप्रदायोके गुरुजनोने अपने फायदे के लिए सायन्सको दूर हटा दिया| शून्य, अंकशास्त्र, आयुर्वेद, योग, प्लास्टिक सर्जरी, ज्योतिष के कारण ब्रह्मांड का ज्ञान, वैदिक गणित, कामसूत्र ये सब सायन्स नहीं तो क्या है? वैज्ञानिको कदर न करो कोइ बात नही, वो प्रसिद्धिके भूखे नहीं है| वो लोग तो उनके रिसर्च कार्य मे डुबे रहेते है| पर क्या हमार फर्ज नही है की उन लोगों को बिना तकलीफ कार्य करनेमें हम सहयोग दे?
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