I Love You ,,,,कुछ खट्टा कुछ मीठ्ठा

 I Love You ,,,,कुछ खट्टा कुछ मीठ्ठा 
मुझे एक दिन जोब पर  मजाक करने का मन हुआ। एक मित्रने उसके घर फोन किया किसी काम के लिए। मै जरा मजाकके मुडमें था। मित्रका नाम प्रदीप पटेल, ४६ सालके, बरोडा(गुजरात) के नजदीकके गांवके है।
मेंने पूछाः घर पे फोन करते हो वाइफ को?
उन्होंने कहाः हां।
‘फोन में बात पूरी हो जाए तब I Love You कहेना’ ।
‘फिर तो पूरी रात सो नहीं पाएगी’॥
‘ऐसा क्युं?
‘२० साल हो गए पहेलीबार I Love You सुनेगी तो उसे पूरी रात नींद नहीं आयेगी’।
सब लोग खूब हंसने लगे| वो कहेने लगे मेंने २० सालमें कभी भी ऐसा कहा ही नहीं है। तो मैने पूछा की वाइफने तो एसा आपको कहा होगा ना? तो कहेने लगे उसने भी कभी नहीं कहा है॥ मेंने फिर पूछा किसी गर्लफ्रेन्ड को तो कहा होगा ना? तो कहा की गर्लफ्रेन्डको तो बहुतबार कहा था। पर वो पत्नी नहीं हुइ थी। दूसरेकी पत्नी बन गइ।
दूसरे एक ५५ सालके मित्र ज्योतिन्द्र पटेल को सवाल किया। दादा दोडके! आपने कभी I Love You अपनी वाइफको कहा है? वो ज्यादा एनर्जेटिक है इसलिए हम उन्हें दादा दोडके कह के  के मान देते है।
‘इसमें क्या कहेना?’
‘कोइ दिन तो कहा होगा ना?’
नहीं कभी नहीं सब जानते है वो मेरी वाइफ है और में उसका घरवाला ‘।
‘आप भी ना कैसे हो?’
‘इसमें क्या है  उसे पता है की में उसे छोडके कहीं नहीं जानेवाला और जाउंगा तो वापस आनेवाला ही हुं, वो मुझे प्रेम करती है और में उसे प्रेम करता हुं उसमें  क्या कहेना?’
फिरसे सब हंसे। दूसरे एक भाइने कहा उनकी वाइफको पता है कि ये खोटा सिक्का है कहींनही चलनेवाला वापस ही आएगा। एक नया लडका है २३ सालका सचीन पटेल  मैंने उसे पूछा, सचीन कितने साल हुए शादी को?
‘दो साल’
‘अमरिका आए कितने टाइम हुआ?
‘सिर्फ पांच महिने हुए है’
‘आपने कभी वाइफ को I Love You कहा है?’
‘कहा है बहुत बार कहा है पर यहां की वाइफ का कोइ विश्वास नहीं’
‘अरे भाइ क्युं एसा कहेता है?’
‘अरे भाइ मेरी वाइफ २० साल से यहां रहेती है। यहां की लडकीयोंका क्या भरोसा? कब निकाल दे क्या पता’।
सब लोग बहुत हंसे की पेटमें दर्द होने जैसा हुआ। सचिनकी खुदकी पेथोलोजीकल लेब थी। सब लोग कहेते है क्या लेने आया होगा यहां? पेड(देवादार अमेरिक) परसे हरी नोटो तोडने दूसरा क्या?
दूसरे पीयूष पटेल है ४० सालके हुए कहेने लगे मेंने तो अभी शादी ही नहीं की इसलिए मुझे तो पूछना ही नहीं। बिना विसा के अमेरिकामें आये है इसलिए अब  भारत जा नहीं सकते है शादीके लिए, अगर शादीके लिए जाए तो वापस नहीं आ सकते। उमर बढती जाती है। कोइ लडकी पसंद नहीं आती या किसी लडकी को वो पसंद नहीं आते।
और एक सतीश मास्तर है भरुचके वो भी लगभग ५५ साल के है कहेते है हमारे जमाने में कौन एसा कहेता था ? मैने कभी नहीं कहा। मैने कहा मास्तर कभी तो कहेना चाहिए ना? तो कहेने लगे यार इसमें क्या कहेना? मित्रो मेरा मजाकमें हुए इन्टरव्यु थोडेमें ज्यादा कहेता है। क्या कहेता है ये मेरे मित्र प्रतिभावके रूपमें कहे ऐसी आशा है।
क्या पत्नीको I Love You कहेना चाहिए? कितने भी साल शादीको हुए हो फिर भी कहे सकते है? भले ही सारी रात नींद ना आये कहेनेमें क्या प्रोब्लेम?
ये तो अच्छा हुआ किसीने मुझे ये सवाल नहीं पूछा।

गुरु गुलामी!!!!५० लाख साधु? बापरे!! अधधध!!!

 गुरु गुलामी!!!!५० लाख साधु? बापरे!! अधधध!!!
         *गुलाम मानसिकताको लोग कोलोनियल माइन्ड कहेते है। अंग्रेज  २२० वर्ष भारत पर राज करके गये। इसलिए प्रजाकी मानसिकतामें अंग्रेजी  और अंग्रेजोकी प्रति गुलामी खूनमें आ गइ  है। पर गुरुगुलामी तो प्रजाके अचेतन मनमें समा गइ  है और संतानोको वारसेमें जीन्समें भी देते जाते है।
                   किसीको कोइना कोइ गुरुके बगैर जैसे चलता ही नहीं। ईन्दिरा गांधी हो या जवाहरलाल के गांधीजी या  किसी भी नेता, सब गुरुके पास आशीर्वाद और  सलाह लेनेके लिए दौड जाते है। दूसरे देशके नेता साधुओकी सलाह लेने नहीं जाते, इसलिए वो भारत से बलवान है, और आगे है। साधुओंकी सलाह लेके देशका भला कहां हुआ? देश तो हजार साल तक गुलाम ही रहा है, गरीब और कायर ही रहा है। भीखारीओंकी सलाह से कभी देश बलवान हो सकता है भला? जो मुर्ख होते है वो देशको चलाने के लिए साधू ओंकी सलाह लेने दौड जाते है। हा कोइ अपवाद हो शकटा  है, जैसे की चाणक्य। पर एसे अपवाद कितने? चंद्रगुप्तका साम्राज्य बलवान था क्योंकी चाणक्यने जासूसी संस्थाका महत्व समजाया था। राज्यके जासूस सीधे चाणक्यके पास माहिती देने  चले जाते थे| बाग्लादेशका १९७१में अस्तित्व हुआ उस युद्ध को आधा तो  भारतकी ‘रो’ नामक जासूसी संस्था के कारण ही जीते थे। इस ‘रो’ को छोटा करके लगभग निष्क्रिय बना देने का महापाप श्रेष्ठ जाने जाते मोरारजी देसाइने किया था। कच्छ जितना छोटा इजराएल  देश को कोइ नहीं दबा सकता इसका कारण उनकी जासूसी संस्था ‘मोसाद’ है।
 
            सबको आशीर्वादसे काम चलाना  है। कोइ महेनत नहीं करनी, कर्मका नियम है की कर्मका फल मिलता ही है, कर्म भगवानको भी नहीं छोडते तो फिर आशीर्वादकी क्या जरूरत? अगर प्रार्थना किये  खराब कर्मो या की गइ भूलमेंसे मुक्तिके लिए करते हो तो फिर कर्म के नियम का क्या अर्थ ? बाकी प्रार्थना करते ही रहो कोइ फर्क नहीं पडेगा। भगवान महावीर इस कर्मके नियम को जानते थे, इसलिए जिंदगीमें कभी प्रार्थना नहीं  की थी। भारतमें लगभग ५० लाख साधु है एसा गुजराती दिव्यभास्करमें किसी आर्टीकलमें पढा था। जो ये सच्चा हो तो?
        
                ये ५० लाख साधु कुछ काम नहीं करते|कीसी चीजका उत्पादन नहीं करते, ना ही कोइ सेवा बेचते है। मुफ्तमें प्रजाके पैसे से मजा करते है। एक साधू के पीछे कमसे कम हररोजके ५० रू. खर्च होता है ऐसा मान ले , क्यूंकी ये साधु भूखे नहीं रहेते है।  पैसे कौन देता होगा? ५० रू. से ज्यादा खर्च करते होगें क्योंकी बीडी और गांजेका खर्च कौन देता होगा? उनके खानेका, चायका, दूधका, भगवे वस्त्रका, फलाहार इन सबके लिए वो लोग तो कमाने जाते नहिं है। तो इनका रोजका सादा हिसाब भी गिने तो एक साधुके पीछे ५० रू. के हिसाब से गिने तो ५० लाख साधुओंके पीछे हररोजके २५०० लाख रपिया हुआ। और सालके ३६५ दिनके ९१२५ करोड रूपिया खर्च होते होंगे। ये तमामपैसे प्रजाकी जेबसे जाते है। ये हिसाब तो सीधे सादे फेमस नहीं है एसे साधुओंका खरच जो आम जनताके सिर पे आता खर्च है।जानेमाने गुरुओं तो जनताके करोडो रूपिया एंठते होगे, कुछ भी किये बिना। भारतकी इकोनोमीके लिए बोज है, ये साधू  संस्था। जो देशके विकासमें कोइ काममें नहीं आती। बिना साधुओंके देशका विकास अच्छा होगा, इकोनोमी सुधरेगी। जनता के महेनतके पैसे बचेगें.
               जिसको काम करना नहीं है वो ही भगवे वस्त्र पहेनके साधु बन जाते है। उनका काम हो गया उनको जिंदा रखनेके जिम्मेदारी जनताकी। बहोत  सारे लोग कहेते है की दो चार साधुके कारण सारी साधु संस्थाको बदनाम नहीं करना चाहिए। मेरा कहेना है की दो चार अच्छे साधुओंके कारन पूरी निष्क्रिय साधुसंस्था का बोज क्युं उठाना? स्वामी विवेकानंद जैसे सच्चे साधु और गुरु कितने? और जो सच्चे है वो तो संसारमें रहेके भी भक्ति कर शकते है। पूरा ॠषि जगत शादीशुदा थे। कितने को तो दो पत्नीआं भी थी| कोइ कोइका मानना है की ये साधुओंको स्त्रीआं विचलित करती है। पर विचलित हो जाए एसी साधुता किस कामकी? या फिर सत्रीओंकी भावनाओंको बहेलाके साधू  खुदकी दबाइ हुइ छूपि वासनाको संतोषते तो नही है ना?     
      
                  एक ही रामकथा को बारबार कहे के करोडो ऋपिया जमा करनेवाले बापुओंकी कमी नहीं है ये देशमें। ज्यादा मंदिरो बनाके जनताके करोडो रुपिया पथ्थरोमें डालते है। एक सोमपुरा फेमिलीका भला करने के लिए बाकी जनताकी जेब से पैसे खाली होते है। ये सोमपुरा फेमिली मंदिर नहीं बनायेंगे तो दूसरा काम ढूंढ लेंगे, भूखे नहीं रहेंगे। उनकी कारीगरी मंदिरो के बजाय सोसायटी या एपार्टमेन्ट बनानेमें उपयोग करेंगें। मजदूरोंको काम मिलता रहेगा।
कुंभके मेलेमें गंगा नदीमें स्नान करते वक्त लाखों साधुओंकी फोटो खुशी खुशी छापते है। और शिवरात्रीके वक्त गांजा पीते साधुओंके फोटो भी अखबारवाले छापते है सौर पुण्य कमातेहै। लोग भी खुश होते है, कैसा महान देश है हमारा। दोचार बुद्धु गोरे आ जाये तो लोग ज्यादा खुश हो जाते है, कैसी महान संस्कृति!!! साक्षर लोग  फटाफट लिखते है की एसी महान साधु संस्था है हमारी की गोरे भी मानते है। एक साक्षरने तो लीख दिया की पश्चिमके लोग अपनी संजीवनी विद्यामें विश्वास रखते है। कोमामें चले जाते है वो वापस होशमें आते है पर मरा हुआ जिवित हो सकते है? कोमामें गया  होशमें आता होगा और मानते होगेंकी संजीवनीके प्रयोगसे जिन्दा हुए।
            
              समजनेकी बात है जहां चोरी ज्यादा होती है वहां पुलिसकी जरुरत ज्यादा रहेती है। एसा जहां अधर्म ज्यादा वहां धर्मकी और साधुओं,गुरुओंकी जरूरत ज्यादा।  चोर अपना धंधा चालु रखनेके लिए पुलिसको भ्रष्टाचारी बनाते है,एसेही अधर्म चालु रखनेके लिए साधु, गुरुको भ्रष्टाचारी बनाना पडता है या बनना पडता है। चोर ही पुलिस बन जाए तो किसीको पकडनेकी चिंता ही नहीं।  अधर्मी और कामचोर साधु,गुरु बन जाए तो  सच्चे गुरु खो जाते है। अभिनयके निष्णात गुरु सच्चे गुरु होनेकी एक्टींग करेंगे, प्रवचन देगें, ह्रदयद्रावक कथाए कहेंगे और भोली जनताके करोडो रूपिया आश्रमो बनानेमें लगायेंगे| बादमें उनके लिए झगडे होंगें, खून भी हो जाते है। ये साधुसंस्था देशके लिए नुकशानकारक है। गुरुगुलामी मानस  प्रजाके लिए ज्यादा नुकशानकारक है।*

ब्रह्मचारी किसे कहेते है?

 ब्रह्माध्ययन संयुक्तो ब्रह्मचर्यरतः सदा॥
सर्व ब्रह्मेति यो वेद ब्रह्मचारी स उच्यते॥५१
श्लोकार्थः ब्रह्माध्ययन से युक्त, सर्वदा ब्रह्मचर्यमें प्रीति रखनेवालेके लिए सर्व ब्रह्म है,एसा जो जानता है वो ही ब्रह्मचारी कहेलाता है।                   
    
      आध्य जगदगुरु शंकराचार्य एक महा ब्राह्मिन थे|उन्होने हिंदु धर्ममेंसे बदीओंको हटानेके लिए खूब महेनत की थी। छोटी उमरमें ही देवलोक  हुए थे। उस समयका भारत मतलब जगत। भारतके, जगतके सभी पंडितोको हराया था। एक मात्र महा पंडित मंडन मिश्र बचे थे उनको भी हराया, पर उनकी धर्मपत्नी महा विदूषी ने प्रश्न उठाया की में उनकी अर्धांगीनी हुं तो मुझे हराओं तो ही हार मानी जाय | ओर बालब्रह्मचारीको कामशास्त्रके विषयमें प्रश्न पूछे| बालब्रह्मचारीने थोडा समय मांगा ओर उसमें ज्ञाता बनके पंडित पत्नीको भी हराके जगदगुरु कहेलाए| किस तरह ज्ञाता बने वो एक रहस्यमय कहानी है।     
   कुछ टीकाकार ब्रह्म अध्ययनकी जगह वेद अध्ययन कहेते है। शायद वेद ही ब्रह्म अध्ययन हो एसा मानते हो। पर शंकराचार्य वेदोके ज्ञाता थे। उन्होंने वेद अध्ययन शब्द ही क्यू नहीं  कहा? दूसरा उसमे शंकराचार्यने कहीं स्त्री शब्दका उल्लेख नहीं किया है और नही कहा है की स्त्रीसंग से दूर रहो. पर शायद टीकाकार खुदकी ही मान्यताओं को थोपते हो।    
   सदाचार का मतलब क्या है? अच्छा आचरण करना एसा सादा अर्थ है। किसीको तकलीफ ना दे एसा आचरण| महापुरुषोके आचरणको देखके एसा आचरण अपनाओ या  खुद ही अंदरसे जाग्रत हो के सर्व ब्रह्म है एसी अनुभूति करके ज्ञान प्राप्त हो जाए,ओर अपनेआप आचरण बदल जाये।
   महापुरुषोका आचरणकी नकल एक उपाय है,दूसरा खुदकी  अंदरसे जागृतिसे सदाचरण आना। चाहे बहुत सारे साद आचरण के  श्लोकोका पठन करो फर्क नहिं पडता बल्कि एसा हो शकता है की खंडित व्यक्तित्व हो जाए। एक उदाहरण देखते है भगवान महावीर  एक चींटीको देखकर उसको बचानेके लिए कूद गये। उनहोंने ये जाना है की सर्व ब्रह्म है ओर उसका अनुभव भी किया| इसलिए वो किसीको भी दुःख नहीं दे शकते। अब जैन क्या करेंगे? चींटीको देखके कूद जाएगें,चींटींके दरमें आटा डालेंगे पर व्यवसायमें किसीकी जेब काटनेमें उन्हें ब्रह्म नहीं दिखेगा या जीव नहीं दिखेगा। ये अकेले जैनोकी बात नहीं है हरेककी है। बहुत सारा दान देना, पशुओंके लिए पांजरापोल खोलेगें ओर दूसरी ओंर बेंकोसे करोडो गरीबोंके पैसे ऐंठ लेनेमें उनका जी नहिं हिचकिचायेगा।
    *दूसरी एक नकलकी बात भगवान महावीर १२ साल तप ओर साधनामें रहे तब एक चींटीमें भी ब्रह्मकी अनुभूति हूइ थी। इन १२ सालमें भोजनके कुल दिन गिने तो एक साल ही भोजन लिया था।मानो की   उन्होंने तय किया की मै भिक्षा तब लूंगा जब कोई  लाल कपडे पहेने हुइ स्त्री हो, जिनके हाथमें नन्हा बालक हो, पासमें सफेद रंगकी गाय हो तो हि भिक्षा लूंगा नहीं तो वापस आ जाऊगा। एसी परिस्थिति कब हो? जब तक एसी परिस्थिति ना हो तब तक उपवास किये। एसी शक्यताए १२ सालमें एक सालके दिन जैसी ही हुइ थी मतलब की ३६५ दिन ही भोजन प्राप्त हुआ। अब आजके महाराज क्या करेंगे? एसा नियम तो ले लेंगे ओर भक्तोंको पहेले से एसी शक्यताओंकी व्यवस्था करने के लिए बोल देगें। सब कुछ तैयार ओर महाराजसाहेब आके ये देखके भिक्षा लेके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेंगें। ये तो दंभ हुआ ना? ये आचरणकी नकल हुई इसका क्या अर्थ हुआ? 
 
         *महावीरनी अहिंसा अंदरकी जागृतिके कारण थी जैनोकी नहीं होती॥ भगवान बुद्धकी करूणा अंदरकी जागृतिके कारन थी। अपनी नहीं हो शकती॥ महापुरुष कहेते है की क्रोध नहीं करना चाहिए। अगर हम क्रोध  करना बंद करते है तो क्या होगा? क्रोध अंदर इकठा होगा॥ छोटी छोटी बातों की निराशा क्रोधके स्वरूपमें इकठी होगी। छोटी छोटी अवहेलना क्रोध बन जाएगी बहार से शांत ओर अंदर से जवालामुखीके रूपमें एनर्जी जमा होती रहेगी। ओर एक दिन छोटे से बहाने मिलने पर जवालामुखी फटेगा। मेरा एक मित्र है हमेशा शांत, सदा हंसते रहेते है, सबको हेल्प करते रहेते है, बहार से बहुत अच्छे लगते है. पर हररोज जोबमें ब्रेक में रातको २ बजे चूपके से छुपाया हुआ शराबका पेग मारते है, ओर बादमें अंदर भरा हुआ क्रोध बहार निकलता है। सबके साथ झगडते है ओर उग्र बन जाते है। बादमें ओफीसमें जाके सो जाते है फिर चार बजे जागते है तब फिरसे सरल ओर शांत हो जाते है।
     चलो हम दुर्गुणोसे बचनेके लिए जंगलमें चले जाते है पर वहां भी क्रोधित होने का कोइ चान्स नहिं है। और वापस भीडमें आते है तब अचानक किसीका  पैर पांवपे  पड गया तो गुस्सा आ जाए तो वर्षोकी साधना नाकमयाब रहेगी। एक गुरु ओर उसका शिष्य जा रहे थे रास्तेमें नदी आइ| वहां एक स्त्री नदी पार करने के लिए खडी थी उसे तैरना नहीं आता था। इसलिए वो राह देख रही की कोइ उसे नदी पार करवाऍ। गुरु तो ब्रह्मचारी थे स्त्रीके सामने देख नहीं शकते तो छू कैसे शकते? गुरुने मना कर दिया, पर शिष्यको दया आ गइ उसने  उस स्त्रीका हाथ पकडके नदी पार करने लगा पर पानी ज्यादा गहेरा था इसलिए शिष्यने उस स्त्रीको कंधे पे उठा लिया। ओर नदी पार करवाइ।गुरु शिष्य फिर आगे चले। पर गुरुको चैन नही आया| गुरुको लगाकी शिष्यने गलत किया, स्त्रीका हाथ पकडा और उठाया भी, महापाप हो गया। ब्रह्मचर्यका भंग हुआ। आश्र्म पहुंचने तक शिष्यको डांटा की तुम्हें उसे कंधे पे उठाने की जरूरत नही थी शिष्यने उत्तर दिया की हे! गुरुजी मेंने तो  उस स्त्रीको नदी पार करने के बाद तुरंत उतार दिया पर आप तो अभी तक उठाके घूम  रहे हो। इसे कहेते है बाहरी आचरण।
             हम भारतीय सदाचारके श्लोकोमें ही खोये रहेते है। हमेंशा ब्रह्मचर्यकी बातें करते है, स्त्रीओके दुश्मनकी तरह बर्ताव करते है। क्या स्त्रीओमें ब्रह्म नहीं है? कुछ संप्रदाय वाले स्त्री के मुख तक नहीं देखते|सेक्स को गाली देते ही जाते है|  और सेक्स अंदर ही सप्रेस्ड होता है। थोडा सा चान्स मिला और सेक्स बाहर। बसमें या कहीं भी स्त्री पासमें बैठी तो परेशान करना चालु। मात्र स्पर्श तो ठीक स्त्रीका वस्त्र भी शरीरको छूये तो भी विहवळ हो जाते भारतयोकी सदाचारकी बातें सुनके हंसी आती है| ब्रह्मचर्यका कठिन पालन करेंगे और बादमें कीसी स्त्रीभक्तके प्रेममें फंस जायेंगे। जैसे नित्यानंद फंस गये। किसीने बिपशा बसुके स्तन पर भीडका फायदा उठाके हाथ फेर लिया। एसे है ब्रह्मचर्यके  फायदे।     
    उपरके श्लोकमें शंकराचर्यने कहीं पर भी स्त्रीका उल्लेख नहिं किया| ब्रह्म मे विहरना मतलब ब्रह्मचर्य| सदाय ब्रह्ममें रत रहेनेवाला, मग्न  रहेनावाला, सर्व ब्रह्म है एसा जाननेवाला ब्रह्मचारी माना जाता है। क्या स्त्रीमें ब्रह्म नहीं है? एक नन्हीं बच्चीमें ब्रह्म है एसा मान नहीं सकते? क्युं बेचेन हो जाते है? क्युं की अंदरसे सर्व जीवमें या निर्जीवमें शंकराचार्यकी तरह ब्रह्म नहीं दिखता। जो लोग सेक्स को दबाते है वे  लोगों ही ननहीं बच्ची पर रेप करते है। बच्चीमें बच्ची नहीं पुख्ता  स्त्री दिखाइ देती है इस  लिए बलात्कार कर सकते है । और बादमें मार भी  देते है। जो साधु स्त्री का मुहं तक नहीं देखते नन्ही एक साल की बच्ची तक का मुंह नहीं देखते,वो  नन्हीं बच्चीमें बड़ी  स्त्री को देखते है,उनके सामने अपनी बच्ची को मत ले जाओ। दूर रखो नन्हीं फूल जैसी बच्चीओंको। नन्हीं बच्चीओं पर बलात्कार करनेवाले  क्रिमिनल्स और ऐसे साधुओंमें तात्त्विक रूपसे या मानसिक रूपसे कोइ फर्क नहीं है। चाहे वो लोग अपने पंथके हितमें बलात्कार ना करे फिरभी उनकी बूरी नजरोंसे भी बचाना चाहिए।
      १६०००रानीआं पटरानीआं, महारानीआं  और प्रेमिकाए रखनेवाले श्री कृष्णको मुक्त महापुरुषोने ब्रह्मचारी कहा है। क्या ये सब अज्ञानी थे? आजके साधु या बाबा कहेत है वो सच की मुक्त महापुरुषोने कहा है वो सत्य? कि शंकराचारय कहेत ये वो सही?      
    पहेले अंदरसे जगृत बनना चाहिए। सर्व चीजवस्तु मात्र, जीवमात्रमें ब्रह्म है ये जानना चाहिए। किसी सदाचारकी नकल नही करनी पडेगी। अंदरसे ही सदाचार आ जायेगा। फिर  आप किसीकी जेब काट ही नही सकते। किसी चींटीको मार नहीं सकोगें या उसे देखके कूदना नही पडेगा अपनेआप हो जाएगा। किसी टेक्सकी चोरी नहीं कर पाओगें, भाव ज्यादा नहीं ले पाओगें, कमतोलमाप में चीज नहीं देगें, किसी पर बलात्कार नहीं कर पाओगें, किसीकी उपस्थिति आपको विचलित नहीं कर सकेंगी। सर्वमें ब्रह्म देखेंगे तो किसीको दुःख नहीं दे सकोगें। शंकराचार्यने सभी श्लोक ब्रह्म को जाननेके बाद लिखे है।              
     तो फिर क्या करना चाहिए? सदाचारका आचरण नहीं करना चाहिए? जरूर करना चाहिए। किसीको अचानक तकलीफ क्यूं देनी चाहिए? पर साथ में ध्यान भी करना पडता है। ध्यान ही एक मात्र उपाय है। किसी सदाचारकी नकलसे ब्रह्म नही जान सकतें। अंदरकी जागृतिके लिए ध्यान करो कोइ व्रत या जप तप की आवश्यकता नही है। ध्यानसे ही धीरे धीरे अंदरसे शांत होते जायेगें और बाहर सदाचार आता रहेगा और बढता जाएगा। पता भी नहीं चलेगा।  जे. कृष्णमूर्ति उसे चोइसलेस अवेरनेस कहेते थे । एक साक्षीभाव जागता है, अनासक्त योग पेदा होगा अंदरसे शांत होने से काम(सेक्स)के प्रति रसकम होगा। क्रोध कम हो जायेगा। सबमें ब्रह्म है एसी प्रतितीसे प्रेम और करूणा बढेगी॥ तो बाबा साधु लोगोंने गलत मतलब निकाल दिया की कामसेक्स से दूर रहेना चाहिए। पर ये बाबा साधु तो काम(वर्क)से भी दूर रहेने लगे। गांधीजीने काम-सेक्सको जितनेके प्रयास बहुत सारे किये पर ध्यानको महत्व नहीं दिया और बुढा काम को बिना जीते चले गए। बाह्य सदाचरणसे पाखंडी बन जाते है अगर साथमें ध्यान नहीं किया तो|

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